मुकुंद/अभिमन्यु, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र
यह केंद्र की जल नीतियों, उनकी सिफारिशों और उनके कागजी हश्र की शोक पुस्तिका है। 1987 से 2026 — चार दशक, चार नीतियां, खरबों रुपये। …और वह सवाल जो हर बार शुरुआत में रखा जाता रहा, आज भी खड़ा है। पानी इस देश का कौन सा संसाधन है — जिसे बचाना है, या जिस पर राज करना है?
कागज बदलते रहे, धरती नहीं
देश की पहली राष्ट्रीय जल नीति 1987 में बनी। उसके बाद 2002…। फिर 2012 में। हर बार यही वादे — जल सीमित है, जल बहुमूल्य है। जल सबका है। हर बार यही सिफारिशें — जल-मूल्य निर्धारण करो। भू-जल पर कानून बनाओ। नदी-तंत्र (बेसिन) के हिसाब से योजना बनाओ। …और हर बार अंत में वही हश्र- नीति दस्तावेज अलमारी में और सिफारिशें हवा में।
सबसे निर्मम विडंबना यह है कि 2020 में जो राष्ट्रीय जल नीति का मसौदा जारी हुआ, वह आज तक न तो वापस लिया गया और न ही उसे अंतिम रूप दिया गया। मतलब? साल 2026 में भी जिस जल नीति को आधिकारिक आधार माना जाता है, वह 2012 की है — जब जलवायु परिवर्तन के पर्याप्त आंकड़े नहीं थे।
यह रिपोर्ट किसी प्रशंसा-पुस्तिका के लिए नहीं है। विफलता के आखिरी पन्ने में हमेशा यह पूछा जाता है — नीतियां बनती क्यों हैं, अमल क्यों नहीं होता, खर्च क्यों होता है और काम क्यों नहीं होता?
चार दशक की जल नीतियां
1987 की नीति ने सबसे पहले यह कहा कि जल को “राष्ट्रीय संसाधन” माना जाए और नदी-बेसिन के स्तर पर योजना बने। यह सिफारिश आज तक दोहराई जाती रही और अमल में नहीं आई — बेसिन स्तर की कोई राष्ट्रीय संस्था नहीं बनी।
2002 की नीति ने “सबको पीने का पानी” को प्राथमिकता कहा — वह प्राथमिकता जो हर पिछली योजना में शब्दों तक ही रही। इसी नीति ने ‘मौलिक अधिकार’ की बात छेड़ी, ताकि बाद में अदालतों को वह काम करना पड़े जो संसद को करना था।
2012 की नीति को सबसे परिपक्व दस्तावेज माना जाता है — उसमें एकीकृत जल-प्रबंधन, जल-मूल्य निर्धारण, अपशिष्ट-जल के पुनरुपयोग, और “जल दुर्लभता को ध्यान में रखकर योजना” की बातें थीं। वह समझदारी से भरी थी। और वह उतनी ही बिना दांत के पैदा हुई — क्योंकि वह सिर्फ “मार्गदर्शक” थी, कानून नहीं।
2020 का मसौदा निजी भागीदारी और ‘जल-बाजार’ जैसे प्रावधानों के कारण विवादों में घिर गया। राज्यों ने इसका विरोध किया। और अंततः वह अनिश्चितकाल के लिए “मसौदा” बनकर रह गया।
हश्र का निष्कर्ष: चार दशकों में नीतियों की संख्या बढ़ी, बजट बढ़ा, पर वे चार सिफ़ारिशें, जिन पर पूरी जल क्रांति टिकती है — मूल्य निर्धारण, भू-जल कानून, बेसिन प्रबंधन, और जल-अधिकार — किसी से भी पूरी नहीं हुईं। नीति ने बार-बार सलाह दी। कोई सुनने वाला नहीं मिला।
सिफारिशों का श्मशान
पहला उदाहरण — राष्ट्रीय जल-कानून। 2016 में न्यायमूर्ति बीएन श्रीकृष्ण की अध्यक्षता वाली समिति ने राष्ट्रीय जल ढांचा विधेयक का मसौदा तैयार किया। उसमें वह सब था जो इस देश को चाहिए — जल को मौलिक अधिकार घोषित करना, नदियों को प्रदूषित करने पर दंड, जल-संपदा पर जन विश्वास और जल के निजी स्वामित्व पर रोक। विधेयक बनाया गया…। और वह बनकर रह गया। आज तक संसद में नहीं लाया गया। एक ऐसा कानून, जो देश को दिशा दे सकता था, बुक-शेल्फ की शोभा बन गया।
दूसरा उदाहरण — भूजल अधिनियम। याद रखिए, भारत विश्व में सबसे अधिक भू-जल दोहन करने वाला देश है। देश के तकरीबन 85 प्रतिशत ग्रामीण घर पीने का पानी भू-जल से लेते हैं। फिर भी 2005 में जो मॉडल भू-जल बिल बना और 2016 में जिसका संशोधित संस्करण आया, उसे अधिकांश राज्यों ने अमल में नहीं लाया। क्यों? क्योंकि भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता किसान है। इसके विनियमन को चुनावी रूप से ‘खतरनाक’ माना गया। हर नीति-दस्तावेज में भू-जल कानून की सिफारिश 1987 से मौजूद है। हश्र? वही पुराना — “सिफारिश स्वीकृत, अमल स्थगित।”
तीसरा उदाहरण — जल का मौलिक अधिकार। 2002 और 2012 दोनों नीतियों ने इसकी सिफारिश की। संसद ने मौन रखा। फिर अलग-अलग अदालतों ने अनुच्छेद 21 के तहत जल को जीवन का अधिकार बताया। यानी वह अधिकार, जिसके लिए हमारे नीति-निर्माता कागज लिखते थे। अंततः न्यायपालिका ने उसे थमाया — और वह भी बिना संवैधानिक संशोधन के, बिना किसी ठोस कानून के। यह नीतियों की शक्ति नहीं, उनकी नपुंसकता की कहानी है।
चौथा उदाहरण — 1974 का प्रदूषण कानून। जल (प्रदूषण नियंत्रण एवं रोकथाम) अधिनियम पचास साल से अधिक पुराना है। पर उसकी सजा, उसका जुर्माना, और उसकी निगरानी इतनी ढीली है कि “प्रदूषण फैलाना” आज भी भारत में सबसे सस्ता अपराध बना हुआ है। कुछ उद्योगों के लिए जुर्माना देना उत्पादन लागत से सस्ता है — और यह हिसाब किसी नीति ने कभी पलटा नहीं।
संस्थाओं का हश्र…नाम बदले… ढांचा नहीं
2019 में दो मंत्रालयों को मिलाकर जल शक्ति मंत्रालय बनाया गया — इस उम्मीद के साथ कि जल का एक ही द्वार होगा। पर वह एक द्वार नहीं खुला। वही पुराना गलियारा बचा। आज भी देश में 25 से अधिक मंत्रालय, विभाग, आयोग और एजेंसियां जल पर काम करती हैं — जल आयोग (सीडब्ल्यूसी), भू-जल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी), जल गुणवत्ता (सीपीसीबी), पेयजल विभाग, नमामि गंगे (एनएमसीजी), नदी-जोड़ो (एनडब्ल्यूडीए) और हर राज्य के अपने जल बोर्ड। सबके अपने-अपने आंकड़े और अपने-अपने बही खाते।
सबसे दुखद संस्थागत विफलता तो यह है कि 1987 की नीति से लेकर 2012 तक ‘रिवर बेसिन ऑर्गनाइज़ेशन’ (नदी-बेसिन संगठन) की स्थापना की सिफारिश की गई — पर आज तक एक भी ऐसा राष्ट्रीय स्तर का संगठन नहीं बना, जो पूरे नदी-तंत्र को एक इकाई मानकर उसका हिसाब रखे। जब तक नदी को एक इकाई नहीं माना जाएगा, तब तक ऊपरी राज्य पानी लेगा और निचला राज्य सूखेगा — दोनों के पास अपने-अपने “संस्थान” होंगे, कोई “संस्था” नहीं।
नीतियां कहती हैं कि आंकड़े खुले मिलने चाहिए। जमीनी हकीकत यह है कि नदी के प्रवाह, बांध के पानी और भू-जल के स्तर के आंकड़े जनता को आसानी से नहीं मिलते। जब बाढ़, सूखा या विवाद आता है, तो सबसे पहली लड़ाई आंकड़ों की होती है — न कि पानी की। राष्ट्रीय संस्था के बिना हम पानी नहीं, पहेलियां पढ़ रहे हैं। 40 साल के बाद हाल ही में जल ‘लेखा-जोखा’ की पहल स्वागत योग्य है।
बजट बहा, जल नहीं
देश में बड़ी-बड़ी योजनाएं बनती हैं। बड़ी-बड़ी राशि जारी होती है और बड़ा हिस्सा या तो अप्रयुक्त रहता है या उसका असर नहीं दिखता।
पहला आंकड़ा — शहरी सीवेज। सीपीसीबी के आंकड़ों (2020-21) के अनुसार, देश के शहरों में प्रतिदिन करीब 72,368 मिलियन लीटर (एमएलडी) सीवेज बनता है। उपचार क्षमता महज 31,841 एमएलडी है और उसमें से भी वास्तव में उपयोग होता है केवल 26,869 एमएलडी। यानी देश के शहरों की गंदगी का करीब दो-तिहाई हिस्सा बिना इलाज के नदियों, नालों और भू-जल में मिल जाता है। यह कोई नई बात नहीं — यह वही गणना है जो पिछले 25 वर्षों से हर रिपोर्ट में लिखी जाती है और हर योजना के बाद भी वही बची रहती है।
दूसरा आंकड़ा — नमामि गंगे का हश्र। गंगा के लिए 2014 से कुल मिलाकर 42,500 करोड़ रुपये तक के परिव्यय की घोषणा की गई। 2026 की रिपोर्ट बताती है कि निधियों का उपयोग लगभग 63 प्रतिशत के आसपास अटका हुआ है — एक ही सवाल हर साल लौटता है: “गंगा साफ क्यों नहीं हुई?” और जवाब की शुरुआत हर साल एक ही अलमारी से होती है — बड़े प्लांट कागज पर, थोड़े चालू, कई आधे।
तीसरा आंकड़ा — सूक्ष्म सिंचाई में सिंचाई का सूखा। साल 2015 में शुरू हुई प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) का मूलमंत्र था — “पर ड्रॉप मोर क्रॉप।” भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की 2022 की रिपोर्ट ने पाया कि इस योजना में कई राज्यों ने स्वीकृत संसाधनों का बड़ा हिस्सा अप्रयुक्त छोड़ा और सूक्ष्म सिंचाई का परिकल्पित प्रसार हासिल नहीं हो सका। मतलब: नारा बदला, नदी नहीं।
चौथा आंकड़ा — ‘हर घर जल’ और उसका पानी में निकलना। लक्ष्य शानदार — 2024 तक हर ग्रामीण घर नल का पानी। सरकारी दावा आज 90 प्रतिशत से ऊपर कवरेज का है। पर असली सवाल ‘पाइप’ का नहीं, ‘पायदान’ का है: कितने घरों में नियमित, गुणवत्ता-परीक्षित पानी आ रहा है? स्वतंत्र अध्ययनों ने बार-बार सुझाया है कि घोषित कवरेज और वास्तविक कार्यशीलता के बीच बड़ा अंतर है। योजना का दायरा बढ़ाकर 2028 तक कर दिया गया — अच्छी बात है। अंदेशा है इसका हश्र भी वही ना हो जो पिछली पानी-योजनाओं (राजीव गांधी राष्ट्रीय पेयजल मिशन, भारत निर्माण, स्वजल) का रहा — अगर फिर से सिर्फ कवरेज गिना गया, और गुणवत्ता और टिकाव (रखरखाव) की ओर कंधा नहीं झुकाया गया।
पांचवां आंकड़ा — अटल भूजल योजना (एबीएचवाई)। 2019 में 6,000 करोड़ रुपये की योजना (आधा हिस्सा विश्व बैंक की सहायता से) 8 राज्यों में शुरू हुई — इस मान्यता के साथ कि भू-जल बिना समुदाय की भागीदारी नहीं होगी। अवधारणा सही है, पर जब तक 40 साल पुरानी सिफारिश — भूजल पर विनियमकारी कानून — अमल में नहीं आएगी, तब तक यह योजना सिर्फ एक प्रयोग बनी रहेगी।
…जिन सवालों पर कोई नहीं बोलता
पहला — क्या जल मौलिक अधिकार है ? दो दशक की सिफारिशों के बाद भी संविधान में जल का कोई अधिकार नहीं लिखा गया। अदालतों ने भरपाई की, कानून बनाना बाकी है। एक मौलिक अधिकार वर्षों तक “अदालती राय” पर क्यों टिका रहे?
दूसरा — जल पर दाम आखिर क्यों नहीं लगता? 1987 से सिफारिश, 2012 में भी इसकी पुनरावृत्ति। पर किसी राज्य ने जल-मूल्य निर्धारण का साहस नहीं किया, क्योंकि इसका साहस कोई नहीं कर रहा। इसके बदले बिना कीमत का पानी यानी बिना एहसास का पानी। मुफ्तवाद किसान और शहरी सभी के लिए सस्ता दिखता है — पर इसकी मजबूरी का बिल तो सूखते बोरवेल देते हैं।
तीसरा — सिंचाई के नाम पर तकरीबन 85-90 प्रतिशत पानी क्यों? देश का सबसे अधिक पानी खेतों में बहता है — जिसमें से अधिकांश फिजूल ही जाता है। किसी नीति ने कभी यह तय नहीं किया कि सब्सिडी वाली बिजली ने नलकूप के प्रयोग को किस हद तक पोषित किया और पानी की बर्बादी को। “पर ड्रॉप मोर क्रॉप” नारा है। नारों के बाद फसल की जरूरत के हिसाब से पानी बांटने की योजना अब तक पर्दे के पीछे है।
चौथा — भू-जल पर कानून क्यों नहीं बन सका? विश्व का सबसे बड़ा भू-जल दोहन, लाखों किसान, सैकड़ों जिले। जटिल प्रक्रिया — फिर भी सबसे बड़ा जल-संकट सबसे कमजोर कानून से चल रहा है। मॉडल विधेयकों को नजरअंदाज करना कोई नीतिगत चूक नहीं, बल्कि एक स्वीकृत लापरवाही है।
पांचवां — ट्रीटेड पानी का पुनरुपयोग कहां है? हर नीति कहती है कि उपचार के बाद का पानी खेती, उद्योग, और यहां तक कि हरियाली में लगाओ। हकीकत: नगर-निगमों को पानी बेचना नहीं आता, क्योंकि उसकी कोई बनी-बनाई ‘बाज़ार व्यवस्था’ नहीं है। पानी को कचरा मानने वाला समाज पुनरुपयोग को कभी अपना नहीं सकता।
छठा — नदी-जोड़ो नारा हर युग में उठता है, पर आखिरकार क्यों नहीं हो पाता? 1980 में बनी ‘राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना’ केवल 30 नदी-लिंक की बात करती है। केन-बेतवा लिंक इसकी शुरुआत है। हर कदम पर पारिस्थितिकी का नुकसान (टाइगर रिजर्व का पानी में विलय), लाखों लोगों का विस्थापन, और लागत का विस्फोट (केन-बेतवा की संशोधित लागत ही 44 हजार करोड़ पार) — इस पर विज्ञान और नीति दोनों आपस में कभी बहस तक नहीं कर पाते। “नदियों को जोड़ो” कहो तो आंदोलन, नहीं कहो तो संकट — और बीच का रास्ता कोई तय नहीं करता।
सातवां — जलवायु को नीति कब मानेगी? पुरानी नीतियां 1970-80 के वर्षा-आंकड़ों पर बनी हुई हैं। जिस देश में मानसून हर दस साल में अपना चेहरा बदल रहा है, वहां बरसात की भविष्यवाणी के बिना बनती नीति — कोरोना के बिना बना अस्पताल-प्लान है। यही अंतर रिपोर्ट का मूल सवाल है। नीति को देर से बदलना नीति का हश्र नहीं, बल्कि देश का हश्र बन चुका है।
केवल सवाल नहीं — मांगें, जो नीति बदलने का द्वार खोलें
राष्ट्रीय जल अधिकार कानून — जिसमें जल को नागरिक का मौलिक अधिकार घोषित किया जाए, और जो सिर्फ सिफारिशों का खजाना नहीं, बल्कि दंड और जवाबदेही की संहिता हो।
स्वतंत्र राष्ट्रीय जल आयोग और रिवर-बेसिन संगठन — 1987 की सिफारिश का 40वां जन्मदिन मनाया जा चुका है। अब इसे कानून बनाने का समय आ गया है। एक इकाई, एक नदी, एक हिसाब।
खुला जल डेटा — हर जिले का वार्षिक जल-बजट। उपलब्धता, दोहन, जमा — सार्वजनिक रूप से प्रकाशित हो। बिना आंकड़े न तो बहस सार्थक होगी, न नीति।
भू-जल अधिनियम — अब, और अब ही। नए बोरवेल पंजीकरण, वार्षिक दोहन-सीमा, और सब्सिडी का जल-दक्षता से जुड़ाव। करोड़ों किसानों को ‘अदृश्य पर कब्जा’ नहीं, ‘अदृश्य की रक्षा’ का अधिकार चाहिए।
100फीसद सीवेज उपचार और पुनरुपयोग — 2030 की समय-सीमा। हर शहर की निगरानी खुले आंकड़ों से हो। हर एसटीपी ‘कागज पर नहीं, धरातल पर चले।
जल-मूल्य निर्धारण, पर सब्सिडी सीधे जरूरतमंद तक। पानी महंगा दिखाना नहीं, पानी की कीमत जनता को समझाना — और बचत को बोनस बनाना।
जलवायु-अनुकूल कृषि. कम पानी वाली फसलों, माइक्रो-इरिगेशन, और वर्षा-जल संचय को सब्सिडी का हिस्सा बनाना — न कि विद्युत सब्सिडी से अतिदोहन को रोशन करना।
जन भागीदारी का अधिकार। पंचायतों का अपने जल-बजट पर अधिकार हो। ‘जल-सभाएं’ जो नीति की समीक्षा करें — क्योंकि उपभोक्ता के बिना कोई नीति टिकती नहीं, सिर्फ पन्नों की तरह पलटती है।
कौन सुनेगा कागज की आवाज
यह रिपोर्ट नीतियों की कहानी नहीं है। यह उन लोगों की कहानी है, जिनके पीछे नीतियां लिखी जाती हैं — वह किसान, जिसका बोरवेल सूख गया। वह शहर, जिसकी बाल्टी रात-दिन लाइन में खड़ी रहती है। वह ग्रामीण महिला, जिसका दिन पानी से शुरू और पानी से खत्म होता है। नीति का ‘हश्र’ इनके जीवन से मापा जाता है — कागजों से नहीं।
1987 में जब पहली जल नीति बनी थी, तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि 2026 में भी हम उसी सिफारिशों को दोहरा रहे होंगे। चार दशक में नीति ने चार बार नया नाम लिया। धरती ने चार बार सूखा देखा। जब तक नीति सिर्फ “सलाह पत्रक” रहेगी और जल सिर्फ “क्षेत्रीय विषय”, तब तक हर साल हम नई-नई किताबें पढ़ेंगे, और पुरानी बाल्टियां उठाए रहेंगे।
जल नीति को अब देश की ‘आंख’ बनाना होगा — हर सिफारिश पर एक डेडलाइन। हर रुपये का एक हिसाब। हर जिले पर एक जल-बजट— और सबसे ऊपर, जल पर सबका हक, सबकी नजर।
तब ही वह दिन आएगा, जब कोई मां अपनी बेटी से कह सकेगी — “बेटी, इस बार बोरवेल पर मत जाना। घर के नल में ही पानी है।”
और तब ही इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा सच साबित होगा — नीति वह नहीं जो लिखी जाए, बल्कि वह जो जी ली जाए। — जल नीति का असली हश्र हम खुद हैं।
संदर्भ स्रोत
-राष्ट्रीय जल नीति 1987, 2002, 2012। जल नीति 2020 का मसौदा (जल संसाधन मंत्रालय/जल शक्ति मंत्रालय)।
-राष्ट्रीय जल ढांचा विधेयक 2016 (न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्ण समिति)।
-मॉडल भूजल (संरक्षण एवं प्रबंधन) अधिनियम 2005/2016, सीजीडब्ल्यूबी गतिशील भू-जल मूल्यांकन (2023)।
-सीपीसीबी राष्ट्रीय रिपोर्ट 2020-21 (सीवेज उत्पन्न/क्षमता/उपयोग — 72,368/31,841/26,869 एमएलडी)।
-नीति आयोग, समग्र जल प्रबंधन सूचकांक (2018) — ‘600 मिलियन उच्च-चरम जल-तनाव’, ’21 शहरों में डे जीरो’ की चेतावनी।
-कैग रिपोर्ट्स — दिसंबर 2024 (नदी प्रदूषण), जनवरी 2025 (भूजल), 2022 (पीएमकेएसवाई ), उत्तराखंड ‘नमामि गंगे’ ऑडिट (2025)।
-पीआईबी / जल शक्ति मंत्रालय — नमामि गंगे (परिव्यय ₹42,500 करोड़), जल जीवन मिशन विस्तार 2028, अटल भूजल योजना (₹6,000 करोड़, 8 राज्य)।
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना (1980) / एनडब्ल्यूडीए— नदी-जोड़ो (केन-बेतवा संशोधित लागत ₹44,605 करोड़, 2023)।
विश्व बैंक / राज्य दस्तावेज — एबीएचवाई कार्यान्वयन आकलन।
