रसिन गांव उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड के चित्रकूट जिले के कर्वी ब्लॉक में है। रसिन राज्य के पूर्व लोक निर्माण राज्यमंत्री चंद्रिका प्रसाद उपाध्याय गांव है। फोटो - इंटरनेट मीडिया

रसिनः कहां गए ‘अस्सी कुआं, चौरासी ताला’

मुकुंद, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र

एक गांव, जो कभी अपने बच्चों को प्यासा नहीं रखता था और आज पानी की एक बूंद के लिए तरसता है।

“अस्सी कुआं, चौरासी ताला, तब बना रसिन का दिवाला।” यह चार शब्दों की कोई साधारण लोक कहावत नहीं है। यह बुंदेलखंड के एक पूरे अतीत का स्मारक चिह्न है — एक ऐसा अध्याय, जिसे पढ़ते ही आज के हालात याद आते हैं और आंखें नम हो जाती हैं।

बांदा-चित्रकूट की सीमा पर, विंध्य पर्वत की गोद में बसा रसिन गांव कभी किसी स्वर्ग से कम नहीं था। गांव के कोने-कोने में अस्सी कुएं और चौरासी तालाब — चारों ओर छलछलाता जल। बुजुर्ग आज हंसते हुए नहीं, आंखें भिगोते हुए कहते हैं, “उस जमाने में जो मेहमान भी आता, उसकी पहली प्यास यहीं बुझती थी। पशु-पक्षी को भी कोई हांक कर नहीं भगाता था।”

ये कुएं-तालाब महज गड्ढे नहीं थे। ये एक ऐसे शासक-दर्शन की धरोहर थे, जिस युग में पानी को सबसे बड़ी संपत्ति माना जाता था — उस युग का एक चमकता स्मारक।

किंतु आज, वही गांव बूंद-बूंद पानी को तरसता है।

जहां कभी तालाब लहलहाते थे, वहां अब मिट्टी भरी है। जहां कुएं गहरे और भरे हुए थे, वहां अब सूखे मुंह खुले खड़े हैं। जहां जल था, वहां अब या तो घर हैं, या खेती, या बस अतिक्रमण की दीवारें। पानी से भरे वे कोने आज किसी की जेब तर कर रहे हैं — किसी की प्यास नहीं। विडंबना यह है कि जिस धरती पर कभी “पानी” शब्द बेशकीमती नहीं था, आज वहां “बूंद-बूंद पानी” के लिए जंग लगा हैंडपंप भी वरदान लगता है।

इतिहास की गोद में जन्मा एक जल-स्वर्ग
रसिन का नाम सदियों पुराना है। इसे समझने के लिए हमें बुंदेलखंड के उस युग में लौटना होता है, जब शासक जल को मात्र सुविधा नहीं, बल्कि राज्य की सबसे बड़ी संपदा मानते थे।

बुंदेलखंड विश्वकोश के अनुसार, रसिन (रासिन) गांव की स्थापना का श्रेय चंदेल काल के प्रमुख शासक/सामंत ‘राहिल’ को जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार मुंशी ईश्वरी प्रसाद लिखते हैं — “राहिल ने बांदा के पास रासिन नामक ग्राम बसाकर अनेक सरोवरों का निर्माण कराया था।” किंवदंती के अनुसार यहां अस्सी तालाब थे, और पुरातत्वज्ञ जनरल कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में 19 तालाबों की सूची दी थी, जिनमें “अधिक ताल” सबसे प्रसिद्ध था।

स्थानीय बुजुर्ग (खबर लहरिया की रिपोर्ट के अनुसार) इन जल-स्रोतों का निर्माण परमार वंश के राजाओं से जोड़ते हैं। इतिहास के स्थानीय पाठों में यह अंतर आम है। विश्वकोशों एवं पुरातात्त्विक प्रमाणों के आधार पर अधिक स्वीकृत दृष्टिकोण चंदेल काल का ही है — पर दोनों को जानना जरूरी है, क्योंकि दोनों ही एक सच की ओर इशारा करते हैं: रसिन की जल-संपदा सदियों पुरानी और राज्य-प्रायोजित थी।

रसिन की यह संपदा बुंदेलखंड की कोई इकलौती घटना नहीं थी। यह एक विराट परंपरा का हिस्सा थी।

चंदेल शासकों ने 740 ईस्वी से 13वीं शताब्दी तक सर्वाधिक जल-संरचनाएं बनवाईं, जो इतनी सुदृढ़ थीं कि आज भी उपयोग में हैं।

मुंशी ईश्वरी प्रसाद के अनुसार — चंद्रब्रह्म ने 500 कुएं और 100 तालाब, मानब्रह्म ने 72 तालाब, जयशक्ति ब्रह्म ने 400 तालाब और 500 कुएं, तथा शक्ति ब्रह्म ने 100 तालाब और 100 कुएं का निर्माण करवाया था।
यह केवल संख्या का खेल नहीं था। ये तालाब गुरुत्वाकर्षण और वैज्ञानिक ढलान पर आधारित थे — ऊंचाई पर स्थित मुख्य तालाब भरने पर उसका अतिरिक्त पानी ओवरफ्लो होकर नीचे के तालाबों को एक-एक करके भरता जाता था। आज के ड्रोन और सैटेलाइट जिसे दोबारा खोज रहे हैं, वही सदियों पहले की यह इंजीनियरिंग थी।

एक समय रसिन की जल-संपदा भूगर्भ जलस्तर को बनाए रखने में जीवन-रेखा का काम करती थी। तालाब धरती के फेफड़ों की तरह थे — वर्षा का पानी सोखकर आस-पास के कुओं को साल भर भरे रखते। गांव के हर मोहल्ले, हर मजरे तक पानी की पहुंच थी।

आज वहीं हैंडपंप का जमाना है। गांव में लगभग 250 हैंडपंप लगे हैं, जिनके बगैर काम नहीं चलता। लगभग 13 हजार ग्रामीण, 42 मजरों में फैले — पानी के लिए सूखते हैंडपंपों का मुंह ताकते हैं। पशु-पक्षी, जो कभी तालाब से पानी पीते थे, आज उनका कोई अपना जलाशय नहीं।

कुछ तालाबों पर गांव के लोगों ने ही खेती शुरू कर दी (जोत लिए)।
कुछ पर घर बन गए, कुछ मिट्टी से भर गए।
कुएं सूख गए — इतिहास बनकर रह गए।

ग्रामीण कहते हैं — “जब-जब गांव में बैठक होती है, हम आवाज उठाते हैं, पर कोई सुनवाई नहीं होती। और सिंचाई कौन करेगा, जब गांव के ही बड़े लोगों ने तालाबों पर कब्जा कर रखा है?”

यह संकट केवल प्यास का नहीं है। यह गरीबी, स्वास्थ्य, विवाह-संबंधों, सम्मान और अस्तित्व का संकट है:

महिलाएं दूर से पानी ढोती हैं। बच्चे स्कूल से पहले पानी भरते हैं।
कई युवाओं की शादी नहीं होती — क्योंकि लड़की पक्ष कहता है, “पानी नहीं है, इसलिए बेटी यहां नहीं दे सकते।”

क्षेत्र में कोल, कोंदार, सहरिया जैसे आदिवासी-वंचित समुदाय का जीवन इसी संकट से बंधा है। कोल समुदाय उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति में रखा गया, जबकि पड़ोसी मध्य प्रदेश में उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा है — यह एक ही समुदाय, कागजों में दो अलग-अलग पहचान। और पानी की हर बूंद तक पहुंच में भी दीवारें हैं, जहां दलित/वंचित समुदाय की महिलाएं दूसरों के बाद ही पानी भर सकती हैं।

रसिन बांध — एक प्यास, अनेक सवाल
इस प्यास का समाधान खोजने के लिए आधुनिक सरकारों ने एक बड़ा कदम उठाया — रसिन बांध। पर इसकी कहानी भी निराशा और सवालों से भरी है।

यह बांध बाणगंगा नदी पर, बांदा-चित्रकूट की सीमा पर बना। 2003 में नींव पड़ी, 2004 में निर्माण शुरू हुआ, 2011 में बांध तैयार हुआ।
शुरुआती लागत लगभग 76 करोड़ रुपये थी, जो बढ़कर 141 करोड़ (अंततः 141.64 करोड़) हो गई — यानी लगभग दोगुनी।
मार्च 2021 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसका भव्य “लोकार्पण” किया और दावा किया कि इससे 17 गांवों की लगभग 4-5 हजार हेक्टेयर जमीन सिंचित होगी।
पर यह सवाल किसी के भी मन से नहीं निकलता — जिस बांध का उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने 2011 में किया था, उसी का दस साल बाद दोबारा “लोकार्पण” क्यों? बीच में, 2012 में, समाजवादी पार्टी सरकार के तत्कालीन सिंचाई मंत्री शिवपाल यादव ने भी यहां निरीक्षण भवन का उद्घाटन किया था।

सबसे गहरी समस्या पानी की ही है। बांध के जलाशय का स्रोत बाणगंगा नदी और बरसात है — पर यह पहाड़ी इलाका है, जहां बरसात कम होती है और नदी लगभग सूख चुकी है। जब जलाशय में ही पानी नहीं, तो नहरों में क्या बहेगा? लोकार्पण के वक्त तक नहर में पानी नहीं था। बाद में छोड़ा गया पानी भी कुछ ही दूर तक पहुंचा। दोनों नहरों की लंबाई 11 किलोमीटर से बढ़ाकर 24.1 किलोमीटर की गई, पर इतना कम पानी सिंचाई के काम नहीं आता।

और वह दर्द जो बांध सबसे गहरा काटता है, वह है मुआवजे का। जिस जमीन पर बांध बना, उसके मालिक — गरीब, अनपढ़ किसान — वर्षों मुआवजे के चक्कर काटते रहे। बांध बनते समय मुआवजा मात्र 20 से 25 हजार रुपये प्रति बीघा था, जबकि आज वहां जमीन 7.5 लाख रुपये प्रति बीघा की है। दलालों ने उनकी अनपढ़ता का फायदा उठाया और कई किसान आज भी सिंचाई विभाग के चक्कर काटते हैं।

जो सुकून पुराने कुओं-तालाबों से मिलता था, क्या रसिन बांध कभी उसे लौटा पाएगा? — यह एक अनुत्तरित प्रश्न आज भी ग्रामीणों के होंठों पर है।

एक समय हमारे पूर्वज पानी को पूजते और संजोते थे। आज हमने पानी को बाजार में बेच दिया, और अतिक्रमण के लालच में अपनी ही धरोहर दबा दी। पर समाधान अब भी मौजूद है — और वह हमारे अपने ही अतीत के पन्नों में दफन है।

पुराने कुओं-तालाबों का पुनरुद्धार: अतिक्रमण हटाकर, गाद निकालकर (डी-सिल्टिंग) और जलग्रहण क्षेत्र को सुधारकर पुराने जल-स्रोतों को पुनर्जीवित किया जा सकता है। यह रसिन बांध के विपरीत स्थानीय और टिकाऊ समाधान है — क्योंकि इसमें न तो बड़ी धनराशि डूबती है, न जमीनें जाती हैं, न मुआवजे के चक्कर लगते हैं।

वर्षा जल संचयन — पथरीली धरती का सबसे बड़ा हथियार। विंध्य के पथरीले, ढलान वाले इलाके में बहता वर्षा-जल रोकना ही सबसे कारगर उपाय है — ठीक वैसा, जैसा चंदेल-बुंदेला शासक सदियों पहले करते थे।

बांध से आगे बढ़ें — छोटे स्रोतों की शृंखला: गांठ बांध लीजिए — बड़े बांधों से अधिक ‘पानीदार’ समाधान छोटे तालाबों, बंधानों और चेकडैम की शृंखला है, जो वर्षा-जल को बहने से रोककर धरती की प्यास बुझाती है।

जनसहभागिता और समान पहुंच: जल-प्रबंधन में महिलाओं और वंचित/आदिवासी समुदायों की भागीदारी जरूरी है। पानी का वितरण जाति या हैसियत के आधार पर नहीं, मानवता के आधार पर होना चाहिए।

यह सब संभव है — और इसका जीता-जागता उदाहरण पास ही है- जखनी गांव, बांदा।

जखनी मॉडल: कभी सूखे के लिए कुख्यात बांदा जिले का जखनी गांव आज जल-संरक्षण का देशव्यापी मॉडल है। इसका श्रेय जाता है उमाशंकर पाण्डेय को — जिन्हें लोग ‘पानी का पहरेदार’ कहते हैं। युवावस्था में दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। करीब 30 वर्षों से वे “खेत पर मेड़ और मेड़ पर पेड़” के मंत्र से जल बचा रहे हैं — बिना एक रुपये के सरकारी अनुदान के। उनके ‘मेड़बंदी’ (खेत पर मेड़ बनाकर वर्षा-जल रोकने) के मॉडल से 2,000 बीघे में मेड़बंदी हुई और जखनी के कुएं-तालाब आज भीषण गर्मी में भी लबालब भरे रहते हैं।

उनके इस अभियान की सराहना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी ‘मन की बात’ में की और नीति आयोग ने उन्हें भूजल-संरक्षण समिति का सदस्य नामित किया। 2023 में भारत सरकार ने उनकी इस तपस्या को पद्मश्री से सम्मानित किया। उनका मॉडल बांदा की 470 से अधिक ग्राम पंचायतों में लागू हो चुका है।

उमाशंकरकहते हैं — “पानी सरकार का नहीं, समाज का मुद्दा है। जब से हम प्राकृतिक संसाधनों के लिए सरकार पर निर्भर होने लगे, तब से ही नदी-तालाब सूखने लगे।”

अगर जखनी ने बिना किसी सहायता के यह कर दिखाया, तो रसिन क्यों नहीं? इसका उत्तर एक ही है — इच्छाशक्ति और जनसहभागिता।

उपसंहार: “अस्सी कुआं, चौरासी ताला, तब बना रसिन का दिवाला” — यह कहावत आज रसिन की खोती जल-विरासत की गवाह है। पर यह केवल विलाप नहीं, एक वचन भी है, जो हमें अपने पूर्वजों के जल-ज्ञान की ओर लौटने को कहता है। क्या वह दिन लौटेगा, जब रसिन का हर घर, हर खेत, हर बच्चा पानी से भरा होगा?

यह हम पर है। इतिहास गवाह है — जब तक हमने अपनी पुरानी जल-व्यवस्था को संभाला, बुंदेलखंड प्यासा नहीं था। वह तो आधुनिक दिखावे और अतिक्रमण के नाम पर हमने जो विरासत खोई, वही आपदा बनी। आज नहीं तो कल, अगर वे कुएं फिर से भरेंगे, तो उस दिन रसिन फिर से जी उठेगा — और बुंदेलखंड की यह सूखी धरती, एक बार फिर, अपने बच्चों की प्यास बुझाएगी।

क्योंकि जल कोई वस्तु नहीं, अस्तित्व है। और इसे बचाना सिर्फ रसिन या बुंदेलखंड का नहीं, हम सबका कर्तव्य है।

मुख्य स्रोत
खबर लहरिया — रसिन गांव जल-विरासत, विश्व जल दिवस 2021, रसिन बांध मुआवजा (2021), पाठा क्षेत्र जल संकट (2022)
द वायर (मनोज सिंह, 2022) — रसिन गांव, रसिन बांध, विस्थापन
बीबीसी हिन्दी (2021) — रसिन बांध लोकार्पण विवाद
ईटीवी भारत (2019) — रसिन बांध परियोजना शिलान्यास
दुधवा लाइव (2013) — रसिन बांध, मछली पालन, मुआवजा विवाद
बुंदेलखंड विश्वकोश — चंदेल/परमार कालीन जल-संरचनाएं; मुंशी ईश्वरी प्रसाद, जनरल कनिंघम
इंडिया वाटर पोर्टल / डॉ. काशी प्रसाद त्रिपाठी — बुंदेलखंड के तालाब
दैनिक जागरण, नवभारत टाइम्स, आज तक, प्रभात खबर, द बेटर इंडिया — जखनी गांव, उमाशंकर पाण्डेय, पद्मश्री
जनगणना 2011 — रसिन गांव

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