कुवैत में ऐसा मंजर आम है। फोटो - इंटरनेट मीडिया

कुवैतः जिस देश में कोई नदी कभी बही ही नहीं

मुकुंद/अभिमन्यु, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र से

कुवैत में हर बूंद समुद्र से छीनकर और छनकर बनी है। यह दुनिया का इकलौता देश है, जिसकी पूरी आबादी 90 प्रतिशत पेयजल समुद्र के पानी को उबालकर बनाती है। और फिर हर नागरिक प्रतिदिन 447 लीटर पानी सिर्फ अपनी खर्च कर देता है। फारस की खाड़ी के किनारे बसा कुवैत दुनिया भर में तेल की दौलत के लिए जाना जाता है। इस देश का गहरा रहस्य यह है कि वहां पानी नाम की कोई प्राकृतिक संपत्ति है ही नहीं । ना नदी, ना झील, ना बारिश करने वाले स्रोत। अगर कोई देश दुनिया का नंबर-एक जल संकटग्रस्त देश है, तो वह कुवैत ही है।

संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी इंडिकेटर 6.4.2) और विश्व संसाधन संस्थान (डब्ल्यूआरआई) के आकड़ों के अनुसार — कुवैत का जल संकट स्तर (वॉटर स्ट्रेस) 3,850 प्रतिशत है। यह विश्व में सबसे अधिक है। इस हिसाब से कुवैत अपने प्राकृतिक जल से 38 गुना ज्यादा पानी खींचता है। यही नहीं, विश्व बैंक के अनुसार कुवैत के प्रति व्यक्ति आंतरिक नवीकरणीय जल संसाधन शून्य (0) है — यानी पूरी कमाई समुद्र और मशीनों से।

क्योंकि यह कहानी सिर्फ कुवैत की नहीं — रेत के हर देश की और धीरे-धीरे हम सबकी है।

डब्ल्यूआरआई के एक्वाडक्ट जल-जोखिम नक्शे के अनुसार, कुवैत का जल संकट ‘एक्सट्रीमली हाई’ श्रेणी में है — यानी अपने नवीकरणीय जल का 80 प्रतिशत से भी ज्यादा दोहन।

एसडीजी 6.4.2 के आंकड़े में कुवैत की स्थिति 3,850.5 प्रतिशत पर है। दूसरे नंबर पर यूएई (1,509.9प्रतिशत), तीसरे पर सऊदी अरब (974.2 प्रतिशत)। यानी कुवैत इतना आगे है कि पीछे वाले अपने रिकॉर्ड से भी दोगुना कम हैं।
प्रति व्यक्ति पुनर्नवीकरणीय जल 5 क्यूबिक मीटर प्रति वर्ष तक सिमट गया है। यह दुनिया के सबसे गरीब देशों में से भी बदतर हाल है। और 2022 के ताजा आंकड़ों में यह शून्य पर पहुंच चुका है।

विडंबना यह है — दुनिया का सबसे कम पानी वाला देश, दुनिया में सबसे ज्यादा पानी की खपत करता है। कुवैत में प्रति व्यक्ति पानी की खपत 447 लीटर प्रतिदिन है, जबकि ब्रिटेन में यह तीन गुना कम। हर साल यह खपत औसतन 3.6 प्रतिशत बढ़ रही है। सड़कों पर कार धोने से लेकर बगीचों की हरियाली और घरों के दो-तीन बाथरूम तक में पानी बरबाद किया जाता है। संकट गहरा है पर जीवनशैली कोई समझौता करने को तैयार नहीं। कुवैत का भूजल ज्यादा खारा (ब्रैकिश) है। उत्तरी इलाके में थोड़ा कम है। 1977 में प्रति व्यक्ति नवीकरणीय जल 17.3 क्यूबिक मीटर था। 2018 में 4.8 क्यूबिक मीटर — यानी 1960 के दशक से 91 प्रतिशत की गिरावट। 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद हालत और गंभीर हुई। तेल रिसाव ने भूजल (एक्वीफर) की परतों को दूषित कर दिया।

कुवैत का 78 प्रतिशत पानी अपरंपरागत स्रोतों से आता है। समुद्री जल से अलवणीकरण (डिसेलिनेशन) 49 प्रतिशत, उपचारित अपशिष्ट का पुनर्उपयोग (वॉटर रिसाइक्लिंग) 29 फीसद, और भूजल 22 प्रतिशत। इसका मतलब है — एक कौम का पानी, उसकी ऊर्जा के साथ बंधा हुआ है। पानी बनाने में खपत होने वाली ऊर्जा देश की कुल ऊर्जा का 55 प्रतिशत ले जाती है। सरकार पानी की उत्पादन लागत के लिए 92 फीसद सब्सिडी देती है — यानी जिस पानी को करोड़ों की मशीनें बनाकर देती हैं, उसकी कीमत पानी के मुकाबले रत्ती भर भी नहीं है। इसीलिए बचत के सारे दरवाजे बंद हैं।

कुवैत की जमीन अति शुष्क मरुभूमि (हाइपर-एरिड डेजर्ट) है। वहां वार्षिक वर्षा औसतन केवल 121 मिलीमीटर और वाष्पीकरण 3,000 मिलीमीटर से भी ज्यादा है। यानी जो बूंदें बरसती भी हैं, वे जमीन को छूने से पहले ही आकाश में लौट जाती हैं। नदी नहीं, झील नहीं, स्थायी जल संरचना नहीं ।

बढ़ता तापमान वाष्पीकरण को और बढ़ाता है। जलवायु अनुमानों के अनुसार 2050 तक स्थिति और भयानक होगी। शहरीकरण (अरबनाइजेशन), आबादी का दबाव और खाना आयात करने की मजबूरी — तीनों मिलकर जल-संकट को आर्थिक और सुरक्षा संकट बना देते हैं। कुवैत खाना आयात करता है क्योंकि खेती के लिए पानी नहीं और आयात ही उसकी खाद्य सुरक्षा का गला घोंटता है।

आदमी चाहे तो पानी बचा सकता है — पर तभी, जब उसकी कीमत वसूली जाए। कुवैत में पानी की सब्सिडी 92 प्रतिशत है। घर-घर पानी आ रहा है। जैसे प्राकृतिक रूप से आता है। कम कीमत + उच्च आय = अकारण खपत। पानी की आपूर्ति 100 प्रतिशत कवरेज पर है — जो सुविधा सरकार को गर्व देती है, वही सबसे बड़ी फिज़ूलखर्ची की जड़ भी है।

डिसेलिनेशन के लिए भारी ऊर्जा चाहिए। कुवैत इस ऊर्जा को जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल — तेल गैस) से जलाकर बनाता है — यानी पानी बनाने के लिए धरती की धमनियां खोदकर हम हवा का गला घोंटते हैं। गर्मी और कार्बन-डाई-ऑक्साइड (सीओटू) — दोनों बढ़ती हैं। जलवायु बिगड़ती है। संकट बढ़ता है। इस पूरे फेरे में कुवैत ने 1951 में समुद्री जल से पीने का पानी बनाने वाला विश्व का पहला प्लांट तैयार किया। और आज उसके 11 प्लांट दिन में 31 लाख क्यूबिक मीटर पानी उगलते हैं। यह तकनीकी उपलब्धि है पर संकट का समाधान नहीं।

कुवैत अब अपनी कथा बदल रहा है। कुछ कदम उठाए गए हैं। कुछ अभी राह में हैं। कुवैत सरकार ने कच्चे तेल की जगह नेचुरल गैस और भविष्य में सोलर एनर्जी के उपयोग का मार्ग चुना है। जब समुद्र से पानी लेना ही हो, तो कम से कम धुएं के साथ लीजिए। कुवैत की उम्म अल-हैमन (यूएएच) परियोजना फरवरी 2024 से शुरू हो गई है। करीब 1.6 अरब यूरो की लागत आई है। इसमें से ऊर्जा का 40 प्रतिशत बायोगैस से तैयार किया जाता है। यह योजना भविष्य का मॉडल है। कुछ सालों में इसकी क्षमता 0.7 एमसीएम (प्रतिदिन) तक बढ़ेगी। कुवैत की कोशिश है कि गंदा पानी कुवैत की खाड़ी में न जाए। इसके लिए 2004 में विश्व का सबसे बड़ा मेम्ब्रेन आधारित पुनर्उपयोग संयंत्र देश में दूसरी जिंदगी दे रहा है — और अब उत्तरी कब्द संयंत्र (चीन के सहयोग से, 1.0 एमसीएम-पर-डे) बनने वाला है। लक्ष्य: ‘समुद्र में शून्य छोड़ना’ — यानी कुवैत की खाड़ी में गंदा पानी नहीं जाएगा।

इसका सही समाधान 447 लीटर प्रतिदिन की खपत को घटाकर 200 लीटर पर लाना, किसी नए प्लांट से सस्ता है। कुवैती तेल कंपनी (केओसी) अपने तेल-क्षेत्रों में उपचारित अपशिष्ट जल का उपयोग शुरू कर रही है — जिससे पीने का पानी खेतों और उद्योगों के बजाय केवल लोगों के लिए बचेगा। कुवैत ग्लोबल वॉटर ऑर्गेनाइजेशन का संस्थापक सदस्य है। यह गंभीर जल संकट वाले देशों का गठबंधन है।

कुवैत की त्रासदी हमें सिखाती है — पानी की कमी कभी ‘भूगोल’ से शुरू नहीं होती। वह ‘फैसले’ से शुरू होती है। जिस देश के पास नदी नहीं, उसने नदी बनाने का तरीका खोज लिया — समुद्र से। जिस देश के पास वर्षा नहीं, उसने बादलों से तो नहीं, पर मशीनों से पानी निकाल लिया। यह हौसला आसमान में सुराख करना सरीखा है।

पर यह सच भी है — मशीन से बनाया पानी प्यास नहीं बुझाता। वह खपत और बढ़ाता है । कुवैत अब समझ चुका है कि असली समाधान ‘बनाने’ में नहीं, ‘बचाने’ में है। और यह सबक सिर्फ कुवैत के लिए नहीं — उन तमाम देशों के लिए भी है, जो आज अपनी नदियां, नालों में और भूजल खाली गड्ढों में बदल रहे हैं। कुवैत ने अपना संकट समुद्र से छीनकर बनाया है।

जल के बिना धन-दौलत मिट्टी है। कुवैत ने मिट्टी पर महल बनाए हैं…। पर महल की बुनियाद — पानी की बूंद — समुद्र से उधार ली है। उधार में जीना, हमेशा नहीं चलता। यही कुवैत की कथा है… और हम सबके लिए चेतावनी।

मुख्य स्रोत
-एसडीजी इंडिकेटर 6.4.2 (यूएन-वॉटर / एफएओ) — जल-संकट स्तर 3850.5 पर्सेंट (2020-23 डेटा)

-विश्व संसाधन संस्थान (डब्ल्यूआरआई) — एक्वाडक्ट वॉटर रिस्क एटलस
विश्व बैंक — प्रति व्यक्ति नवीकरणीय जल: 4.8 क्यूबिक मीटर (2018), शून्य आंतरिक संसाधन; खपत 447 लीटर-प्रतिदिन

-साइंसडायरेक्ट (2024) — “नेविगेटिंग कुवैत्स वॉटर स्कारसिटी चैलेंजेस”
फ्रंटियर्स इन एनवायरनमेंटल साइंस (2022) — “डिटेल्ड पर्स्पेक्टिव ऑफ वॉटर रिसोर्स मैनेजमेंट… कुवैत”

-जर्नल ऑफ सस्टेनेबिलिटी रिसर्च (2025) — “फ्रॉम स्कारसिटी टू सस्टेनेबिलिटी: फुल-साइकिल वॉटर रियूज”

-डिसेलिनेशन न्यूज (12 जनवरी, 2026) — कुवैत की जल-आपूर्ति प्रणाली
इकोहबमैप (2026) — वॉटर क्राइसिस इन कुवैत; राष्ट्रीय अलवणीकरण क्षमता, 84.8 पर्सेंट शहरी आपूर्ति

-विज़ुअल कैपिटलिस्ट — वर्ल्ड्स मोस्ट वॉटर-स्ट्रेस्ड कंट्रीज; लिस्ट फ्रेश वॉटर पर पर्सन

-वर्ल्ड पॉप्युलेशन रिव्यू — वॉटर स्ट्रेस बाय कंट्री (2023-26)

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