मुकुंद/अभिमन्यु, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र
साल 2012 को याद करें। संसार को “वॉटर, एनर्जी एंड फूड सिक्योरिटी” (जल-ऊर्जा-खाद्य सुरक्षा) के संकट से जोड़ने के लिए भारत ने एक बड़ा मंच खड़ा किया — इंडिया वॉटर वीक ( आईडब्ल्यूडब्ल्यू यानी भारत जल सप्ताह)। इस साल इसका पहला संस्करण 10-14 अप्रैल को नई दिल्ली में आयोजित किया गया। तब से यह मंच लगातार बढ़ता गया। अब 2026 से इसका नाम बदलकर “इंडिया इंटरनेशनल वॉटर वीक” (अंतरराष्ट्रीय भारत जल सप्ताह) कर दिया गया है। यह नौवां अंतरराष्ट्रीय भारत जल सप्ताह 22 से 26 सितंबर के बीच नई दिल्ली के भारत मंडपम में रंगबिरंगी पानी की बूंदों से चमकेगा। इसकी थीम — “क्लाइमेट रेसिलिएंट वॉटर मैनेजमेंट” (जलवायु-लचीला जल प्रबंधन) है। जल शक्तिमंत्री सीआर पाटिल ने के अनुसार, 49 सत्र होंगे। 150 देशों को निमंत्रण भेजा गया है। 11 भागीदार देश हैं। 84 केंद्रीय मंत्रालय और 36 राज्य-केंद्रशासित प्रदेश भी इसके हिस्सा होंगे। यानी सब कुछ दुनिया की दृष्टि से।
हर दुनिया-जहां भर की बातें होती हैं। सवाल है कि जमीन पर क्या उतरा? यह त्रासदी भी विचलित करती है कि जिस मंच पर दुनिया भर के वैज्ञानिक बैठकर जल-सुरक्षा के फार्मूले गढ़ते हैं, उसी देश में हर साल 60 करोड़ लोग पानी की कमी के जोखिम में होते हैं।
यहां इतिहास और वर्तमान के बीच जो सवाल खड़ा है, वह सरकारी ब्रोशर में नहीं मिलता। आठ संस्करण…। आठ थीम…। और वही पुराना पानी-संकट। देखिए, हर बार थीम बदली। भाषण बदले, पर समस्या घटने के बजाय बढ़ती गई।
ध्येय वाक्य (थीम)
2012- वॉटर, एनर्जी एंड फूड सिक्योरिटी
2013- एफिशिएंट वॉटर मैनेजमेंट
2015- वॉटर मैनेजमेंट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट
2016- वॉटर फॉर ऑल: स्ट्राइविंग टुगेदर
2017- वॉटर एंड एनर्जी फॉर इन्क्लूसिव ग्रोथ
2019- वॉटर कोऑपरेशन – 21वीं सदी की चुनौतियां
2022- वॉटर सिक्योरिटी फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट विद इक्विटी
2024- पार्टनरशिप्स एंड कोऑपरेशन फॉर इन्क्लूसिव वॉटर डेवलपमेंट
हर थीम की पृष्ठभूमि में करोड़ों रुपये का आयोजन। हजारों प्रतिनिधि। 2024 में तो 4,500 से अधिक डेलीगेट थे। जिनमें 40 देशों के 215 विदेशी प्रतिनिधि। 160 से ज्यादा प्रदर्शक कंपनियों के स्टॉल। पर असली सवाल यह है कि क्या इससे कुछ बदला? नीति आयोग का 2018 का अनुमान आज भी याद रखिए — “2030 तक देश के 60 करोड़ लोगों को पानी की तीखी कमी का सामना करना पड़ सकता है।” …और वह 2030 अब दरवाजे पर दस्तक देने वाला है।
सबसे बड़ी समस्या यह है — “कितने सुझाव लागू हुए”। इसका कोई सार्वजनिक हिसाब नहीं है। न ही सरकार की वेबसाइट पर किसी संस्करण से निकले सुझावों की लागू होने वाली सूची है, न कोई “ट्रैकर”। 2024 के संस्करण की रिपोर्ट में कहा गया,”सुझावों को संबंधित मंत्रालयों, राज्य सरकारों द्वारा नीति-निर्देशों में विचार किया जाएगा।” “विचार किया जाएगा” — यह शब्द खतरनाक है। यही वाक्य अगर टंगा रहा, तो हर आयोजन बाद में “आईना जगह-जगह जलाते रहे, घर अंधेरा ही रहा” जैसा सिद्ध होता है।
हां, कुछ अच्छी खबरें भी हैं — सरकार बताती है कि “जल संचय जन भागीदारी” अभियान (सितंबर 2024 से) में 60 लाख से ज्यादा जल-पुनर्भरण/संरक्षण संरचनाएं बनीं और मई 2026 तक 1 करोड़ संरचनाओं का लक्ष्य रहा। 2019 में जल शक्ति मंत्रालय का गठन सिंगल-विंडो के तौर पर हुआ। जल जीवन मिशन ने ग्रामीण घरों में नल-जल पहुंचाया। पर — इनमें से कितना सीधे जल सप्ताह के सुझावों से आया, और कितना अलग-अलग सरकारी अभियानों से? इसका कोई जवाब नहीं, कोई ऑडिट नहीं। और जल-संचयन की असली तस्वीर यह है कि देश के भू-जल क्षेत्र, नदी-खंड, और किसान की प्यास — अब भी उसी रफ्तार से बढ़ रही है।
इन आयोजनों का एक आम स्वरूप है — अंत में “रिकमेंडेशन” (सुझाव) का एक दस्तावेज छपता है। जैसे 2022 में जल-शासन में सहयोग, अपशिष्ट-जल का पुनर्उपयोग, इंटर-बेसिन ट्रांसफर (नदी-जोड़ो), समुदाय-केंद्रित जल प्रबंधन।
2024 में पीपीपी मॉडल, रीयल-टाइम डेटा प्लेटफार्म, स्प्रिंगशेड प्रबंधन, भू-जल विनियमन, जीएलओएफ (ग्लेशियल झील) पर निगरानी, राष्ट्रीय जल प्रबंधन मंच। पर इनमें से किसी को “राष्ट्रीय जल नीति या जल ढांचा कानून” के लिए बाध्यकारी नहीं किया गया।
नेशनल वाटर फ्रेमवर्क बिल 2016 और नेशनल वाटर कमीशन की जरूरत 2016 से आज तक लटकी है। जल सप्ताह में कही गई बात और संसद में पारित होने वाला कानून — दोनों की अलग दुनिया हैं।
वाटर वीक सुझावों की एक बड़ी दुर्बलता यह है कि उन्हें लागू करने के लिए 17 से ज्यादा विभाग और एजेंसियां जिम्मेदार दिखती हैं — केंद्रीय जल आयोग, केंद्रीय भू-जल बोर्ड, राज्यों की अपनी एजेंसियां, जल शक्ति मंत्रालय, कृषि, पर्यावरण, शहरी, ग्रामीण विकास, बिजली — सब अलग-अलग। कोई एक भी ऐसा मंच नहीं है जो जल सप्ताह के सुझावों को सभी विभागों में एक झटके में पहुंचाए। सुझाव विभागों के बीच फिसलते रह जाते हैं।
2024 और 2026 के संस्करण में इंटरनेशनल वाश कॉन्फ्रेंस हुई। यह अच्छी बात है। पर इससे सवाल और गहरा होता है — जब इतने बड़े मंच पर स्वच्छ जल और शौचालय की बात होती है तो देहात में शौचालय तो बन गए, पर उसका अपशिष्ट कहां जाता है? जवाब है — अधिकतर नदियों और नालों में। वह भी बिना उपचार के। यानी मंच की “सस्टेनेबिलिटी” और जमीन के “सीवेज” में फासला।
वित्त और “वाटर बॉन्ड” जैसी योजनाएं केवल कागजों में दिखती हैं। 2019 से ही भारत में वाटर फाइनेंस फोरम सुझाव देता आया है — वॉटर बॉन्ड, ब्लेंडेड फाइनेंस। 2024 में भी यही सिफारिश। पर नदी-बहाली और जल-बुनियादी ढांचे के लिए जरूरी कई खरब रुपयों का हल अब भी नहीं निकला। यानी मंच ने “फाइनेंस” की बात की, देश ने “फाइनेंस” का इंतजार किया।
यह रिपोर्ट केवल आलोचना नहीं है। हम चाहते हैं कि यह मंच सचमुच काम करे। इसके लिए छह ठोस सुझाव हैं —
- “रिकमेंडेशन ट्रैकर” जनता के सामने। हर संस्करण के बाद सुझावों की एक सार्वजनिक सूची, जिसमें हर सुझाव के आगे लिखा हो — “लागू / आंशिक / लंबित, जिम्मेदार विभाग, समय-सीमा”। यह एक वेबसाइट पेज से शुरू हो सकता है। जवाबदेही के बिना कोई सुझाव जमीन पर नहीं उतरता।
- जल सप्ताह को “जन-मंच” बनाइए — सिर्फ डेलीगेट्स का नहीं। हर साल जिलेवार 5-6 गांवों/शहरों का प्रतिनिधिमंडल (किसान, महिलाएं, सरपंच) मुख्य सत्र में बुलाइए, और उनके जल-सवाल सीधे मंत्रालय के सामने रखिए। जिसका पानी खत्म हो रहा है, वही इस मंच की असली आवाज है।
- सुझावों को कानून में ढालने की तय अवधि। कहिए कि “जल सप्ताह 2026 के सुझाव” 12 महीने के अंदर प्रासंगिक नीति/बिल में जाएंगे। यानी हर आयोजन के पीछे एक “डेडलाइन-बंधा बजट” दिखे।
- ग्राउंड-डैशबोर्ड जनता के हाथ में। सीडब्ल्यूसी का जल-डेटा, सीजीडब्ल्यूबी का भूजल-स्तर, नदियों की गुणवत्ता — सब एक ही सार्वजनिक डैशबोर्ड पर। जो जल सप्ताह में “रीयल-टाइम डेटा” कहता है, वही डेटा किसान-अंबेडकर-नगर पालिका तक पहुंचे।
- बजट-बंधन: “जल सप्ताह के सुझाव” के कार्यान्वयन के लिए एक अलग कोष। पानी के नाम पर लाखों करोड़ की बातें होती हैं। जल-वित्त के लिए खुद का वाटर-बॉन्ड जारी किया जाए — जिससे ग्रामीण जल-संरचनाओं की निर्माण और मरम्मत की अलग व्यवस्था बने।
- पुरानी विरासत + नई तकनीक का मेल। 2019 में ही राष्ट्रपति ने कहा था — “पारंपरिक जल-ज्ञान को नई तकनीक से जोड़िए।” पर सुझाव के पन्ने मोड़ने और जमीन पर कुएं-झरनों-तालाबों को पुनर्जीवित करने के बीच आज भी फासला है। इसे पाटिए — मनरेगा की 65 प्रतिशत राशि जल-संरक्षण में लगाने की घोषणा को जमीनी कार्रवाई में बदलिए।
“अंतरराष्ट्रीय” नाम से नहीं, जमीन से बनता है मंच
इंडिया इंटरनेशनल वॉटर वीक — यह नाम शानदार लगता है। पर याद रखिए — यह मंच जिम्मेदारी का अहसास कराता है। जब तक हर सुझाव के पीछे नाम-पता वाला एक कार्ययोजना अधिकारी नहीं बैठता, जब तक हर संरचना के पीछे पंचायत का हस्ताक्षर नहीं होता, तब तक हम केवल पानी पर भाषण सुनते रहेंगे।
क्या इन 14 वर्षों में जल-संचयन में बदलाव आया? जवाब —आधा-अधूरा। अगर हम सदाशयता से देखें, तो हां — अभियान, लक्ष्य, जनभागीदारी बढ़ी है। अगर ईमानदारी से कहें तो अभी भी ज्यादा करने को बचा है — तभी तो सरकार खुद बताती है कि 2026 में फिर चर्चा होगी।
मंच शक्तिशाली है तो वहां बोलने वाला भी मजबूत होना चाहिए।वाटर वीक का सबसे बड़ा वक्ता कोई मंत्री न हो, बल्कि वह किसान हो, जो आज भी सोचता है, “बारिश तो होती है, पर पानी कहां जाता है?” जल सप्ताह अगर सचमुच “अंतरराष्ट्रीय” बनना चाहता है, तो उसे पहले “ग्रामीण” बनना होगा। जहां से जल शुरू होता है — वहीं से उसका सप्ताह होना चाहिए।
मुख्य स्रोत
indiawaterweek.in (अधिकृत वेबसाइट) — IWW इतिहास (2012–2024), IIWW-2026 विवरण, IWW 2012/2019/2022 पेज
पीआईबी (22.04.2026, PRID 2254585) — केंद्रीय मंत्री सी. आर. पाटिल द्वारा 9वें IIWW-2026 का शुभारंभ
पीआईबी (सितंबर 2024) — 8वें इंडिया वॉटर वीक की समापत्ति-रिपोर्ट; भु-नीर पोर्टल लॉन्च
आईडब्ल्यूडब्ल्यू-2024 पोस्ट-सेशन प्रोसीडिंग्स (DoWR, RD & GR, नव. 2024) — 2024 के सुझाव (पीपीपी, डेटा प्लेटफार्म, स्प्रिंगशेड, GLOF, जल-शासन)
नवंबर 2022 (7वां IWW, 1–5 नवंबर 2022, ग्रेटर नोएडा) — थीम एवं सुझाव; “ETGovernment” का टिप्पणी-लेख (जल-शासन पर उदास बहस)
राष्ट्रपति भवन का संबोधन (24.09.2019, 6वां IWW) — जल शक्ति मंत्रालय, जल जीवन मिशन, एक्वीफर मैपिंग का दायरा
टेरी-रिपोर्ट (2019) — समग्र जल-प्रशासन एवं SDG 6 पर सुझाव; नेशनल वाटर फ्रेमवर्क बिल 2016
पॉलिसी एज / आईएएसपॉइंट (अप्रैल 2026) — जल संचय जन भागीदारी: 60 लाख+ संरचनाएं, 1 करोड़ का लक्ष्य
IWMI (अक्टूबर 2024) — 8वें IWW की मुख्य उपलब्धियां, जल-शासन सुझाव
