टाठी घाट। दाएं सह लेखक अभिमन्यु भाई (अभिमन्यु सिंह)। फोटो - वाटर वॉच वर्ल्ड

चित्रकूट का टाठी घाट: जहां मंदाकिनी गोल होकर बहती है और तपस्वियों का संसार वन में बसता है

मुकुंद/अभिमन्यु, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र

इस बार चित्रकूट में पहली नजर टाठी घाट की निर्मल मंदाकिनी पर पड़ी। यह वही नदी है, जिसे महर्षि वाल्मीकि ने हजारों साल पहले ‘मणि-सा जल वाली’ कहा । जंगल में साधुओं की कुटियां…। सिद्ध संत और हिरण-तेंदुए की बेखौफ दुनिया। देखिए…जहां जंगल जीवित है, वहीं नदी निर्मल है — और जहां यह कहानी जीवित है, वहीं से पानी की असली कहानी शुरू होती है।

यमुना की गोद में पलने वाली मंदाकिनी जिस जंगल में गोल होकर बहती है, उसे कहते हैं टाठी घाट। जहां राम ने पूजा की। ऋषियों ने उन्हें थाल भेंट की। आज भी जटाधारी संत वही स्नान-तपस्या करते हैं। चीतल, सांभर, तेंदुआ और भालू की दुनिया के बीच। अनसुइया की तपस्या से उतरी मंदाकिनी की निर्मल धारा मन मोह लेती है।

दिल्ली में यमुना का पानी झाग से धधकता है पर चित्रकूट के टाठी घाट पर मंदाकिनी दर्पण की तरह साफ है। इसका रहस्य वही —यहां जंगल जीवंत है। कंक्रीट का नाम-ओ- निशान नहीं है। जहां वन है, वहीं पानी है; जहां पानी है, वहीं जीवन है। यही वह जगह है, जहां साधु, हिरण और सप्तर्षि एक ही सांस में जीवित हैं — और हमें याद दिलाते हैं कि हमने क्या खोया है।

सर अलेक्जेंडर कनिंघम की प्रसिद्ध पुस्तक द एंशिएंट ज्यॉग्रफी ऑफ इंडिया (भारत का प्राचीन भूगोल) (1871) में चित्रकूट का उल्लेख मुख्य रूप से प्राचीन भारत के मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे बुंदेलखंड व पौराणिक भूगोल के संदर्भ में किया गया है। कनिंघम ने इस ग्रंथ में प्राचीन यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों, बौद्ध काल, और महा काव्यकालीन स्थलों की स्थिति को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।

सर अलेक्जेंडर कनिंघम की महानिदेशक के रूप में तैयार की गई आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) रिपोर्ट्स में जरूर चित्रकूट की मंदाकिनी नदी और कामदगिरि पर्वत से जुड़े पारंपरिक और पुरातात्विक महत्व का संदर्भ है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट्स और ऐतिहासिक दस्तावेजों में चित्रकूट का संदर्भ दो रूपों में है। पहला — सर अलेक्जेंडर कनिंघम के ऐतिहासिक सर्वेक्षणों (1862–1884) में और दूसरा वर्तमान में इस क्षेत्र की धरोहरों के संरक्षण और जीर्णोद्धार से जुड़े आधुनिक कार्यों में।

सर कनिंघम ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया रिपोर्ट्स (संस्करण XXI) में चित्रकूट का जिक्र रामायण काल की प्रसिद्ध तपोभूमि, ऋषि वाल्मीकि और अत्रि ऋषि से जुड़े स्थलों के रूप में रेखांकित किया है। उन्होंने कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा परंपरा और उसकी तलहटी में बहने वाली मंदाकिनी नदी (मंदाकिनी को उन्होंने स्थानीय नाम ‘पैसुनी’ या ‘पयस्विनी’ भी लिखा है) के ऐतिहासिक महत्व का जिक्र किया है।

टाठी घाट में भक्ति, वन और निर्मल जल तीनों एक साथ जीते हैं — भगवान राम की पूजा से जुड़ा नाम, सिद्ध संतों का एकांत, और वह नदी जिसे आदिकवि वाल्मीकि ने हजारों वर्ष पहले ‘मणि-जैसे निर्मल जल वाली’ कहा था। इस घाट में महानगरों के शोर से निकलकर जब आप बेड़ी पुलिया से करीब 15 किलोमीटर घने जंगल में घुसते हैं, तो सड़क ही नहीं, समय भी बदल जाता है। जंगल में करीब ढाई किलोमीटर पैदल चलने के बाद आता है टाठी घाट। जहां पानी इतना निर्मल है कि उसमें आसमान नहाता है, और साधु इतने एकांत में हैं कि खुद भगवान से बात करते हैं।

कहते हैं कि जब भगवान श्रीराम चित्रकूट आए तो इसी स्थान पर उन्होंने पूजा-अर्चना की। ऋषियों ने उन्हें पूजन के लिए थाल (टाठी) भेंट की — और इसी से पड़ा नाम ‘टाठी घाट’। बुंदेलखंडी और बघेली बोली में ‘टाठी’ का अर्थ थाली और गोला होता है। मंदाकिनी नदी इस स्थान पर गोल आकार लेती है, जैसे थाली की तरह फैल गई हो। यह स्थान सिर्फ आज की आस्था का नहीं — आदिकवि वाल्मीकि का लिखा पहला महाकाव्य यहीं के जंगल और नदी का सबसे पुराना साक्ष्य है। चित्रकूट का पहला उल्लेख वाल्मीकि रामायण में ही मिलता है। और टाठी घाट का वर्तमान चित्र — घने जंगल, ऋषियों का स्नान, निर्मल जल और निर्भय वन्य-जीवन — वाल्मीकि के शब्दों में लगभग शब्दशः मौजूद है।

वाल्मीकि रामायण (अयोध्याकांड, सर्ग 95) से मूल अंश: “जटाजिनधराः काले वल्कलोत्तरवाससः । ऋषयस्त्ववगाहन्ते नदीं मन्दाकिनीं प्रिये ॥” अर्थात हे प्रिये! जटा, मृगचर्म और वल्कल-वस्त्र धारण करने वाले बड़े-बड़े ऋषि मंदाकिनी में स्नान करते हैं। आज भी टाठी घाट पर वही दृश्य है। दाढ़ी-जटा वाले तपस्वी, वल्कल के वस्त्र, और मंदाकिनी का वही निर्मल जल।

“क्वचिन्मणिनिकाशोदां क्वचित्पुलिनशालिनीम् । क्वचित्सिद्धजनाकीर्णां पश्य मन्दाकिनीं नदीम् ॥” अर्थ- देखो, यह मंदाकिनी कहीं मोतियों के समान स्वच्छ जल वाली है, कहीं ऊंचे बालू-तट लिए हुए है, और कहीं उसमें सिद्ध-जन अवगाहन कर रहे हैं।

“सिद्ध-जनों से भरी नदी” — यही वह वाक्य है, जो टाठी घाट के अदृश्य संतों की याद दिलाता है। यहां आने वाले कम ही जानते हैं कि इन कुटियाओं में ऐसे संत विचारमान हैं, जो कभी-कभार सामने आते भी हैं तो ऐसा लगता है जैसे जंगल से उनका जन्म हुआ हो।

“दर्शनं चित्रकूटस्य मन्दाकिन्याश्च शोभने । अधिकं पुरवासाच्च मन्ये तव च दर्शनात् ॥” अर्था शोभने! चित्रकूट और मंदाकिनी का यह दैनिक दर्शन मुझे अयोध्या-निवास से भी अधिक सुखद लग रहा है।

“उपस्पृशंस्त्रिषवणं मधुमूलफलाशनः । नायोध्यायै न राज्याय स्पृहयेऽद्य त्वया सह ॥” अर्थ- तीनों समय स्नान करते हुए, फल-मूल व शहद पर जीवन बिताते हुए, आज तुम्हारे साथ मैं अयोध्या के राज्य की भी इच्छा नहीं करता।

“इमां हि रम्यां मृगयूथलोडितां निपीततोयां गजसिंहवानरैः । सुपुष्पितां पुष्पभरैरलङ्कृतां न सोऽस्ति यः स्यान्न गतक्लमः सुखी ॥” अर्थात जिस नदी को मृगों के झुंड घेरे रहते हैं, जिसका जल हाथी, सिंह और वानर पीते हैं, जिसके कगार पुष्पसमूहों से अलंकृत हैं — ऐसी मंदाकिनी में स्नान करके थकान रहित और सुखी न होने वाला मनुष्य संसार में नहीं है — भगवान श्रीराम का यह वर्णन आज टाठी घाट के वनों में अक्षरशः दिखता है।

महाकवि कालिदास ने रघुवंश के तेरहवें सर्ग में मंदाकिनी का वही वर्णन रखा और मेघदूत में चित्रकूट को ‘रामगिरि’ कहकर अपने यक्ष का वनवास-स्थान बताया है। यानी कालिदास के समय तक भी यह स्थान इतना प्रभावशाली था कि उन्होंने अपने प्रेम-खंडकाव्य की पूरी विरह-व्यथा इसी पहाड़ी-नदी से रंग दी।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामघाट पर भगवान के दर्शन किए — वही प्रसिद्ध दोहा: “चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़, तुलसी चंदन घिसे तिलक देहिं रघुबीर।” और अकबर के दरबारी विद्वान-कवि रहीम (अब्दुर्रहीम खानखाना) भी यहीं के जंगलों में रहे — जब वे जहांगीर से कुपित होकर अपमानित हुए, तो उन्होंने चित्रकूट की पवित्र भूमि को ही अपना आश्रय बनाया। आज जिस जंगल में टाठी घाट के साधु तपस्या करते हैं, वही वन कभी संतों और कवियों का आश्रय रहा है।

ब्रिटिशकालीन पुरातत्वविद् अलेक्जेंडर कनिंघम ने 1883-84 में बुंदेलखंड-रेवा के दौरे का विस्तृत वृत्तांत लिखा। उन्होंने प्रमाणों से तय किया कि वाल्मीकि का चित्रकूट वही है जो बुंदेलखंड में आज खड़ा है — मंदाकिनी, पयस्विनी (पैसुनी), और गुप्त गोदावरी की गुफाओं की पहचान तक उन्होंने अपनी रिपोर्ट में दर्ज की। यानी इस नदी-जंगल की पवित्रता सिर्फ कथाओं की नहीं — पुरातत्व की स्याही से भी प्रमाणित है।

मंदाकिनी यमुना की छोटी और सहायक नदी है। मध्य प्रदेश के सतना जिले की मझगवां तहसील के भठवा पंचायत के ग्राम बरहा (ब्रह्मकुंड) से निकलकर यह चित्रकूट होते हुए उत्तर प्रदेश के कर्वी के आगे राजापुर के पास यमुना में मिलती है। इसकी कुल लंबाई करीब 50 किलोमीटर बताई गई है।

कहते हैं कि जब चित्रकूट में 10 साल वर्षा नहीं हुई और भीषण अकाल पड़ा तो माता सती अनसुइया ने कठोर तपस्या कर मंदाकिनी को धरती पर उतारा — और उसी से यहां वन और हरियाली लौटी। उनका आश्रम इसी नदी के ऊपरी मोड़ पर घने जंगल में आज भी मौजूद है। टाठी घाट इसी जलधारा का वह अध्याय है, जहां मंदाकिनी गोल होकर गहरी, शांत और मंथर हो जाती है।

टाठी घाट का असली सौंदर्य उसका जंगल है — घना, बीहड़ और पवित्र। यहां माया की भीड़ से दूर दर्जनों साधु-संत कुटिया और गुफाएं बनाकर कठोर साधना कर रहे हैं। बताते हैं कि इनमें से कई सिद्ध संत ऐसे हैं, जो आम आंखों से ओझल रहकर भगवान की अराधना में लीन रहते हैं। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में ऐसे संत अब भी तपस्या कर रहे हैं, जो कभी प्रकट नहीं होते। टाठी घाट इसी जनविश्वास का सजीव केंद्र है। ऐसी भी मान्यता है कि चित्रकूट की पहाड़ियां अमर संतों का आश्रय हैं। और इसी दुनिया से अलग टाठी घाट का एकांत है, जहां निज साधना में रत हैं सैकड़ों संत।

और जहां साधु का एकांत हो, वहां प्रकृति को भी अपना ठिकाना मिलता है। इसी जंगल में चीतल और हिरण घास चरते हैं, सांभर व नीलगाय नदी किनारे पानी पीने आते हैं, तेंदुआ और बाघ अपने रास्ते चलते हैं, भालू अपनी मस्ती में, और जंगली कुत्तों का गिरोह अपने किस्सों में व्यस्त रहता है। यानी यहां पारिस्थितिकी का संपूर्ण संसार अपनी जगह पर है — और सबका मेहमान एक: मंदाकिनी का निर्मल पानी।

हर वर्ष दीपावली और अमावस्या जैसे विशेष अवसरों पर लाखों श्रद्धालु चित्रकूट पहुंचते हैं। दीप जलते हैं, घंटियां बजती हैं, और साधुओं का आशीर्वाद लेने की भीड़ मंदाकिनी किनारे जैसा उत्सव बन जाती है। टाठी घाट इस बात का जीता-जागता सबूत है कि निर्मल नदी और जंगल एक-दूसरे की सांस हैं। जहां जंगल हरा है, वहीं मंदाकिनी का पानी दर्पण है। जहां कंक्रीट बढ़ी, वहीं नदी का घाव गहरा (जैसा कि चित्रकूट के रामघाट के फ्लडप्लेन में हुआ)। वाल्मीकि ने सदियों पहले जिस ‘मणि जैसे जल’ का वर्णन किया, वह आज टाठी घाट पर अब भी उपलब्ध है — क्योंकि यहां अभी जंगल जिंदा है।

यह वही संबंध है, जो इस साल के विश्व जल नदी दिवस की थीम ने याद दिलाया — “नो फॉरेस्ट्स, नो रिवर्स, नो वॉटर, नो लाइफ” — जंगल नहीं, तो नदी नहीं; नदी नहीं, तो पानी नहीं; पानी नहीं, तो जीवन नहीं। टाठी घाट इस थीम को बिना कहे जी रहा है। इसे बचाना सिर्फ एक घाट को बचाना नहीं — बुंदेलखंड के उस फेफड़े को बचाना है, जहां साधु, सांभर और सप्तर्षि एक ही आसमान में सांस लेते हैं।

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