मुकुंद/अभिमन्यु भाई/हीरा सिंह, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र से
”हरि अनंत हरि कथा अनंता” —
यह गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाई है। आज अगर गोस्वामी होते तो कहते — चित्रकूट अनंत चित्रकूट कथा अनंता। इसकी वजह है — चित्रकूट के उस संगम की कथा, जहां अब केवल आंसू बहते हैं।
विंध्य पर्वत शृंखला के कामदगिरि की गोद से तीन बहनें निकलीं थीं — मंदाकिनी, पयस्विनी और सरयू। तीनों राघव-प्रयाग पर एक-दूसरे का हाथ थामती थीं। पयस्विनी का पानी दूध जैसा सफेद था। मान्यता है, त्रेतायुग में उसमें दूध ही बहता था। यहीं किनारे प्रभु राम ने पिता दशरथ का पिंडदान किया और वनवास के साढ़े ग्यारह साल यहीं गुजारे। यह जनविश्वास आज भी बुंदेलखंड की माटी में रचा-बसा है।
कहते हैं, जनविश्वास को कभी मरने मत देना — क्योंकि विश्वास ही नदियों की भी रगों में बहता है। पर पिछले साठ साल में धीरे-धीरे, चुपचाप और बेरहमी से भू-माफिया ने नदी की जमीन पर क़ब्जा कर लिया। होटल-आश्रम खड़े कर लिए। अनुपचारित सीवेज उसी ‘दूध’ की धारा में मिला। कंक्रीट ने नदी के झरनों (स्रोत) के मुंह बंद कर दिए।
आज राघव-प्रयाग घाट है — पर न सरयू है न पयस्विनी। उनकी जगह दो गंदे नाले फूटते हैं और उन्हीं से चित्रकूट की आधी गंदगी मंदाकिनी की गोद में गिरती है। मंदाकिनी — जिसके किनारे तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखी — उसका पानी भी अब काला होने लगा है।
जो नदी पाप धोती थी, उसे हमने गंदगी से नहला दिया। जो मोक्ष देती थी, हमने उसे नरक-नाला बना दिया। और जब किसी ने पूछा — तो जवाब में कागजों पर सीमांकन की दुहाई।
मार्च 2022 में जब प्रशासन ने पयस्विनी के जन्म स्थल ब्रह्मकुंड की खुदाई की, तो दस फीट नीचे जल स्रोत फूट पड़ा। नदी मरी नहीं थी — वह सिर्फ इंतजार कर रही थी। उसने उदास होकरप्रतीक्षा की कि कोई उसका हाथ थामे। दूध की धारा अभी धरती के नीचे जिंदा है।
वह चाहती है — अतिक्रमण हटाओ, नाला शोधो, झरना खोदो। महर्षि वाल्मीकि रचित बृहद रामायण के चित्रकूट खंड में इसका उल्लेख मिलता है। यह नदी कामदगिरि के दक्षिण में ब्रह्मकुंड से निकलती थी। संतोषी अखाड़े और निर्मोही अखाड़े के पास से बहती हुई राघव-प्रयाग घाट पर मंदाकिनी में मिलती थी — जिसकी लंबाई करीब तीन किलोमीटर थी।
पयस्विनी का नाम पिशुनी/पेश्वनी नामक नाले तक सिमट गया है। श्रीमद्भागवत में जिसे वर्णित किया गया है, रामचरितमानस के ‘लषण दीख पय उतर करारा’ चौपाई की टीकाओं में जिसे पयस्विनी कहा गया है — वही नदी आज राजस्व रिकॉर्ड में ‘नाला’ लिखी जाती है।
सरयू नदी कामदगिरि पर्वत के पूर्वी तट पर ब्रह्मकुंड से एक धारा के रूप में निकलती थी और पयस्विनी के साथ मंदाकिनी में मिलती थी। यह “सरयू” वही पवित्र नाम है, जिसे गोस्वामी तुलसीदास ने ‘अवधपुरी मम पुरी सुहावनि, उत्तर दिश बह सरयू पावनि’ में अमर किया। हालांकि अयोध्या की सरयू और चित्रकूट की यह सरयू अलग हैं पर चित्रकूट में इसका पावन महत्व जन आस्था के समान ही रहा ।
आज वह धारा सूख चुकी है। एनजीटी की सुनवाई में सरयू-नाला एमपी-यूपी की सीमा पर “डिवाइडर” बन चुका है — एक ऐसा सूखा नाला, जो गीली अवस्था में केवल बरसात के कुछ दिन और उसके बाद एक-आध दिन में सूख जाता है।
एनजीटी में 2015 और 2021 के आदेशों में यह बात दर्ज है — पयस्विनी और सरयू के पानी का रंग रामघाट पर काला और भूरा हो गया है। चित्रकूट नगर पंचायत की पूरी सीवेज व्यवस्था, मठ-मंदिरों का मलबा, होटल-रेस्तरां की नालियां — सब कुछ इन्हीं ‘नालों’ के रास्ते मंदाकिनी में गिरता है। कुछ गिनती के मोक्ष-कामी श्रद्धालु आज भी सोचते हैं कि चित्रकूट में मरना मोक्ष है — पर जिस पानी में मृत्यु के बाद विसर्जन होता है, उस पानी में जिंदा रहते मछलियां भी नहीं बचतीं।
अगर हम चाहें — किसी दिन फिर तीनों बहनें राघव-प्रयाग पर मिलेंगी। उस तीनों रोएंगी — खुशी से।
जब तक वह दिन न आए, एक बात याद रखिए — नदी उस दिन सचमुच मरती है, जब हम उसे याद भी नहीं करते। पयस्विनी को हम याद करते हैं — इसलिए वह जिंदा है। जल ही जीवन है — और जल की रक्षा ही असली वनवास कथा है, जो हमारे समय में लिखी जानी बाकी है।
लषण दीख पय उतर करारा
टीकाकारों का एक मत यही कहता है कि जिस ‘पय’ से लक्ष्मण किनारे उतरे, वह कोई नहीं, पयस्विनी थी। दूध की वही धारा, जिसे शास्त्र ‘पय’ कहते हैं।
और जब अयोध्या की सरयू की बात होती है, तो वही चौपाई मुंह से निकलती है —”अवधपुरी मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिश बह सरयू पावनि।।” पर चित्रकूट की इस पहाड़ी गोद की सरयू — जो कामदगिरि की पूर्वी चोटी से फूटती थी — उसके पावन होने का सबूत आज तटों पर नहीं, सिर्फ शास्त्रों में बचा है।
नदियां लुप्त नहीं हुई हैं, उन्हें समाप्त किया गया है। और उनकी मौत की ज़िम्मेदारी स्वर्ग में नहीं, हमारे पैरों के नीचे की जमीन में खोजी जानी चाहिए।
यहां के संत कहते हैं, “अनसूइया के पास 40 साल पहले नदी में 100 छोटे-बड़े झरने थे। अब वे सब बंद हैं। तटों पर कंक्रीट डालकर सुंदरता बढ़ाने के नाम पर हमने नदी की रगें ही सुखा दीं। पहाड़ियों के खनन ने कैचमेंट क्षेत्र की जल-ग्रहण क्षमता को भी तोड़ा — बारिश का पानी अब मिट्टी में बैठने के बजाय बहकर सीधे चला जाता है।”
रिपोर्ट के मुख्य स्रोत
इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी, 2014) — “चित्रकूट में लुप्त हो गईं दो पावन नदियां”
एनजीटी आदेश — नित्यानंद मिश्रा बनाम म.प्र. (12.08.2021) — indiankanoon.org/doc/120414985
पत्रिका (12 गस्त,2021) — एनजीटी का सीमांकन-आदेश, 18 मकान अतिक्रमण
दैनिक जागरण (03 जुलाई, 2022) — पयस्विनी ब्रह्मकुंड में जल स्रोत, चेकडैम, 22 अतिक्रमण
भास्कर (02फरवरी 2022) / न्यूज-18 (15फरवरी 2022) — पयस्विनी पुनर्जीवन हेतु खुदाई में जलस्रोत
न्यूज-18 (06 अप्रैल, 2023) — पैसुनी नदी: अनसूइया आश्रम से उद्गम, हरा पानी
MPPCB — Mandakini River Revised Action Plan (2019)
डाउन टू अर्थ (01नवंबर,2021) — अतिक्रमण-कंक्रीट-प्रदूषण: मंदाकिनी की मौत
स्वदेशी ऑनलाइन — “कहां गुम हो रही छोटी नदियां” (पयश्विनी-सरयू का संगम वर्णन)
शोध पत्र (2024) — मंदाकिनी: जल-स्तर, वर्षा, जलवायु, भू-जल गिरावट
भारतकोश — पयस्विनी नदी: श्रीमद्भागवत उल्लेख, रामचरितमानस ‘पय उतर करारा’
पर्वकथा (2017) — पौराणिक सरयू नदी का अस्तित्व-संकट
