हरिद्वार में गंगा आरती। यह फोटो पुराना है। इसे इंटरनेट मीडिया से लिया गया है।

गंगा… सीने में जहर और आस्था के कंधे

मुकुंद, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र

यह एक अभिशप्त नदी ‘ पवित्र मां’ गंगा की कथा है। वही मां— जो करोड़ों लोगों की आस्था के कंधों पर सवार हैं, पर जिनका अपना सीना आज जहर से भरा है। हर शाम जब हरिद्वार के हर की पौड़ी पर गंगा आरती की लौ उठती है, तो हजारों आंखें भक्ति से भीग जाती हैं। शंख ध्वनि, मंत्र नाद, और नदी के किनारे खड़ी भीड़ — जो इस नदी को मां कहती है। जो कहती है हर-हर गंगे। लेकिन क्या इनमें से किसी ने उस मां की आंखों में झाँककर देखा है? शायद — नहीं।

उसी आरती वाले घाट पर गंगा जल घुटनों तक भरा होता है। लोग उसी जल में खड़े होकर आरती करते हैं…। उसी जल का आचमन करते हैं। पर क्या वे जानते हैं कि उसी जल में वह सब कुछ घुला हुआ है जो हमारे शहरों के घरों , कारखानों और कभी-कभी श्मशानों से भी निकलता है?

यह गंगा के साथ आज की सबसे बड़ी विडंबना है— दुनिया की सबसे पवित्र नदी आज विश्व के सबसे भारी प्रदूषण का सामना कर रही है। और इसे साफ करने के लिए जो सबसे बड़ा अभियान चल रहा है — ‘नमामि गंगे’ — उसमें अब तक हजारों करोड़ रुपये बह चुके हैं। सवाल है — क्या यह सब पैसा इस नदी की पवित्रता लौटा पाया? या फिर गंगा चुपचाप उस दर्द को अपने भीतर लिए बहती रहेगी, जिसे कोई सुनना नहीं चाहता?

…और इस सच को समझने के लिए याद करिए वो कथा, जो बताती है कि गंगा इस धरती पर उतरकर किस लिए आईं।

गंगा अवतरण — यह कहानी उस दिन से शुरू होती है, जब धरती पर गंगा-जैसी कोई नदी नहीं थी। और इसे जाने बिना आज का गंगा संकट कभी पूरा नहीं समझा जा सकता। हमारे ग्रंथों की प्राचीन कथा के अनुसार, इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया — वह पौराणिक यज्ञ, जिसमें वैभव और स्वतंत्रता के चिह्न के रूप में एक घोड़े को स्वच्छंद घूमने के लिए छोड़ा जाता है। पर वह घोड़ा विचरते-विचरते पहुंच गया महर्षि कपिल के आश्रम तक। सगर के साठ हजार पुत्र जब उसे वापस लाने पहुंचे, तो क्रोधित कपिल मुनि ने एक ही क्षण में उन सभी को भस्म कर दिया। साठ हजार पुत्र…। मृत्यु के बाद मुक्ति नहीं, क्योंकि जिस शरीर का अंतिम संस्कार न हुआ, उसकी आत्मा मोक्ष नहीं पा सकती।

तब समझिए, किसमें थी मुक्ति? केवल गंगा के जल में। सगर के पोते अंशुमान ने, फिर उनके पुत्र दिलीप ने प्रयास किया — पर हार गए। …और फिर जन्मा भगीरथ — उस पीढ़ी का वशंज, जिसे मिली तीन पीढ़ियों की पीड़ा। …और जिसने कर लिया वह तप, जिसकी सानी नहीं। हजारों वर्षों तक एक टांग पर खड़े होकर घोर तपस्या की। ब्रह्मा प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान दिया — “गंगा स्वर्ग छोड़कर धरती पर अवतरित होंगी।”

चिंता: धरती गंगा का भीषण वेग सहन न कर पाएगी। तब शिव उस वेग को सहने के लिए आगे आए। गंगा उतरीं — पहले शिव की जटाओं में, फिर गंगोत्री से होकर धरती पर। भगीरथ ने उस दिव्य धारा को अपने पीछे चलाया — हिमालय से समुद्र तक — और जहां सगर के पुत्रों की भस्म पड़ी थी, वहां गंगा के जल ने उन आत्माओं को मोक्ष दिलाया। कहते हैं, रास्ते में जह्नु मुनि के आश्रम को भी गंगा का वेग डुबोने लगा — तब ऋषि ने उन्हें एक घूंट में पी लिया और फिर छोड़ दिया। इसीलिए गंगा का एक नाम जाह्नवी भी है।

इसीलिए गंगा ‘त्रिपथगामिनी’ कहलाती हैं — स्वर्ग में मंदाकिनी, धरती पर भागीरथी (गंगा), और पाताल में भोगवती। और इसीलिए, जब कोई काम असंभव-सा लगता है, तो हम कहते हैं — यह तो भगीरथ-प्रयास है। यह शब्द यहीं से जन्मा है।

इस कथा का सबसे गहरा अर्थ है — गंगा धरती पर व्यापार के लिए नहीं, वैभव के लिए नहीं — बल्कि मुक्ति के लिए उतरी थीं। पाप-तारिणी। पुण्य-स्रोता। मोक्ष-दायिनी। इसीलिए आज भी लोग उसी के जल से आचमन करते हैं, उसी में अस्थियां विसर्जित करते हैं…। और कहते हैं — ‘गंगा में नहाए तो पाप धुलें।’ गंगा की धरती पर आने की मंशा यही थी: जो धुल सके, वह शुद्ध हो; और जो शुद्ध हो, वह मुक्त हो।

और अब इसी कथा के आलोक में आज का सवाल रखिए — जो पाप धोने के लिए उतरी थी, वह आज स्वयं पाप से घुट रही है। जो मोक्ष देने आई थी, वह आज अपनी ही मुक्ति का इंतजार कर रही है। यही वह विडंबना है, जिसके सारे अध्यायों में गंगा चीख रही हैं।

कहां से जन्मा यह संकट
गंगा का संकट किसी एक कारण से पैदा नहीं हुआ। यह कई परतों में लिपटी एक गहरी त्रासदी है, जिसकी हर परत एक कहानी कहती है।

पहली कहानी — शहरों का मल-जल, बिना उपचारित। यह सबसे बड़ी और सबसे पुरानी कहानी है। गंगा के किनारे सैकड़ों शहर-कस्बे बसे हैं — ऋषिकेश और हरिद्वार से लेकर कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी और फिर कोलकाता तक। इन शहरों से निकलने वाले कच्चे सीवेज (गंदे नाले) का एक बड़ा हिस्सा दशकों तक सीधे गंगा में गिरता रहा। जो सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) बने, उनसे घरों को नहीं जोड़ा गया, जो जुड़े, वे ठीक से चलाए नहीं गए; और जो सही चले, वे भार की तुलना में बहुत छोटे साबित हुए।

दूसरी कहानी — कारखानों का धुआं, नदी की सांसों में। कानपुर की चमड़ा मिलें, जाजमऊ का जहर, मथुरा-वृंदावन के उद्योग, और रामगंगा के किनारे मुरादाबाद का गंदा पानी — खाली घरों का सीवेज ही नहीं, औद्योगिक अपशिष्ट भी गंगा और उसकी सहायक नदियों की धमनियों में घुलता रहा। भारी धातुएं, रसायन और जहरीले पदार्थ — बिना शोधन के नदी की गोद में गिरते रहे।

तीसरी कहानी — प्रधानता का भार। सफाई का दावा करने वाले शिलालेखों के बावजूद, गंगा सिर्फ घरेलू और औद्योगिक कचरे से ही नहीं, बल्कि ठोस कूड़े-कचरे, प्लास्टिक, कृषि की जहरीली दवाओं और उर्वरकों के अपवाह से भी जूझती है। और इन सबके बीच, हमारी पूजा-अर्चना की चीजें — फूल, मालाएं, इमली, दीये, मूर्तियां — भी उसी नदी पर बोझ बनती हैं। आस्था जहां अपना भार डालती है, वहां ठोस निर्णय नहीं लिए जा पाते।

चौथी कहानी — बहाव का संकट। प्रदूषण सिर्फ मिलाने से नहीं होता, बल्कि बहाव (प्रवाह) कम होने से भी होता है। बांधों और बैराजों के चलते नदी का प्राकृतिक बहाव कट गया। जब नदी में पानी ही कम हो, तो गंदगी का घनत्व बढ़ जाता है — जैसे गिलास में कम पानी हो तो चीनी ज्यादा गाढ़ी लगती है। प्रवाह की यह कमी ‘अविरलता’ नहीं, अविरल संकट बन गई है।

पांचवीं कहानी — सबसे गहरी चीख। यह कहना गलत नहीं होगा कि गंगा का संकट केवल जल का संकट नहीं, बल्कि हमारी सरकारी-प्रशासनिक चेतना का संकट भी है। जिन उपायों की योजना बनाई गई, वे कागजों पर सही लगे; पर जमीन पर उनका असर अकसर अधूरा रहा। करोड़ों के खर्च और महंगे बुनियादी ढांचे के बावजूद, कई एसटीपी आज ठप पड़े हैं और कई नगरों में एक भी घर सीवेज सिस्टम से नहीं जुड़ा।

आज का हाल — सुधार की उम्मीद, अधूरे वादों की पीड़ा
सरकार अपनी सफलताओं का ढोल पीटती है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) जैसी स्वतंत्र संस्थाओं की रिपोर्ट कुछ और कहानी कहती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के 2025 के प्रदूषित नदी-खंड आकलन के अनुसार, गंगा की मुख्य धारा में कई जगह सुधार दिखा है।

उत्तराखंड का प्रदूषित खंड पूरी तरह सूची से हट गया — यह 2018 में ‘ ‘प्राथमिकता चार’ श्रेणी में था। यानी ऋषिकेश–सुल्तानपुर खंड अब प्रदूषित नहीं। उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में प्रदूषण में कमी आई है, हालांकि बिहार के कुछ खंड अब भी प्रदूषित हैं। 2024-25 में कराए गए जैविक निगरानी के मुताबिक गंगा और उसकी सहायक नदियों के 76 स्थानों पर जल की जैविक गुणवत्ता अधिकतर ‘अच्छी’ से ‘मध्यम’ श्रेणी में रही। मगर जब भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने झांका तो कहानी और ही कुछ निकली। कैग की उत्तराखंड पर केंद्रित ताजा रिपोर्ट ने वह खुलासा किया, जिसे सुनकर हर आस्था का दिल चाक-चाक हो गया।

कैग की रिपोर्ट के अनुसार, गंगा का उद्गम क्षेत्र ही प्रदूषित है। देवप्रयाग के बाद गंगा का जल आचमन (पीने) योग्य नहीं। ऋषिकेश और हरिद्वार तक यह केवल ‘नहाने योग्य’ श्रेणी में है — यानी जहां करोड़ों लोग गंगा जल की एक बूंद से तृप्त होते हैं, वहीं पानी पीने लायक नहीं है।

मल जनित प्रदूषण अरबों गुना: सुरक्षित स्तर की सीमा 1000 एमपीएन (मोस्ट प्रॉबेबल नंबर) प्रति 100 मिलीलीटर है। पर जांच में यह बढ़कर 24 × 10¹¹ तक पहुंच गया — यानी सुरक्षित सीमा से अरबों गुना अधिक।

एक-तिहाई से अधिक एसटीपी नाकाम: राज्य के एक-तिहाई से अधिक सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बिना उपचारित गंदा पानी सीधे नदी में छोड़ रहे हैं।

जोशीमठ का सच: 42.73 करोड़ रुपये खर्च कर विकसित बुनियादी ढांचा किसी भी घर को सीवेज कनेक्शन देने में शामिल नहीं था — करोड़ों खर्च, वास्तविक कनेक्शन शून्य।

वनरोपण का झूठ: वनीकरण के नाम पर 885.91 करोड़ तय थे, पर महज 144.27 करोड़ (करीब 16 प्रतिशत) ही खर्च हुए। 11 श्मशानों में से 10 का उपयोग ही नहीं हुआ। ये दो चेहरे हैं — एक आशा का, एक अधूरेपन का। और इन्हीं के बीच झूलती है गंगा की सफाई की पूरी कहानी।

हजारों करोड़ का सफर
अब उस प्रश्न पर आते हैं, जो यक्ष प्रश्न है- इस नदी को बचाने पर अब तक कितना पैसा लगा है?
कहानी की शुरुआत होती है जून 2014 से। तब भारत सरकार ने ‘नमामि गंगे’ नामक विशेष कार्यक्रम शुरू किया — जिसे सरकारी भाषा में ‘फ्लैगशिप प्रोग्राम’ कहा गया। शुरुआती बजट था 20,000 करोड़ रुपये। बाद में इसे बढ़ाकर 22,500 करोड़ कर दिया गया और मार्च 2026 तक बढ़ाया गया। यानी दोनों चरणों को मिलाकर कुल 42,500 करोड़ रुपये तक के परिव्यय की घोषणा की गई।

अब तक जितना खर्च हुआ
वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच कार्यक्रम के लिए 26,111.86 करोड़ बजट में रखे गए। 30 जून 2026 तक विभिन्न एजेंसियों को 21,339.57 करोड़ जारी किए जा चुके हैं। एक अन्य गणना के अनुसार, 2014-15 से 30 जून 2025 तक राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) ने 19,679.84 करोड़ परियोजनाओं के लिए जारी किए।
स्वतंत्र विश्लेषण (पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च) के अनुसार, 2014-15 से 2025-26 तक स्वीकृत 30,096 करोड़ में से मार्च 2025 तक केवल 18,842 करोड़ खर्च हो पाए — यानी करीब 63 प्रतिशत उपयोग और यह आंकड़ा पिछले साल के 69 प्रतिशत से भी नीचे चला गया।
कुल परियोजनाएं: अब तक 492 परियोजनाएं शुरू हुईं जिनकी कुल लागत 40,121 करोड़ रुपये से अधिक है। इनमें से 307 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं और चालू हैं।
सीवेज क्षेत्र सबसे बड़ा हिस्सा: 219 सीवेज परियोजनाएं स्वीकृत हुईं, जिनकी लागत 35,970 करोड़ और लक्ष्य 6,610 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) सीवेज उपचार क्षमता बनाना था।
मार्च 2026 तक की सच्चाई: सिर्फ 145 परियोजनाएं पूरी हो सकीं (4,260 एमएलडी क्षमता)। यानी तय लक्ष्य का करीब 64 प्रतिशत ही पूरा हो पाया। जनवरी 2026 तक गंगा बेसिन के पांच राज्यों में 23 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट ठप पाए गए, जिनकी कुल क्षमता 181 एमएलडी है।

वित्त वर्ष 2025-26 की उपलब्धियां (सरकारी आंकड़े)
इस वर्ष 538.03 एमएलडी की नई उपचार क्षमता जोड़ी गई — 18 परियोजनाओं के जरिए, जिनकी लागत करीब 4,700 करोड़ रही।
28 एसटीपी पूरे किए गए (पिछले साल 22 थे)।
2025 में कुल 25 प्रमुख एसटीपी चालू हुए, क्षमता 530 एमएलडी। दिसंबर 2025 तक कुल उपचार क्षमता 3,977 एमएलडी हो गई।
वाराणसी के अस्सी-बीएचयू क्षेत्र में सबसे बड़ी क्षमता जोड़ी गई (55 एमएलडी)। प्रयागराज में 13 नालों को रोककर 43 एमएलडी, आगरा में 166 एमएलडी।
कुल मिलाकर: जून 2026 तक नमामि गंगे के अंतर्गत 4,263 एमएलडी की सीवेज उपचार क्षमता बन चुकी है। पर जिस गंगा को पूरी तरह साफ करना था, उसके लिए अब भी बहुत काम बाकी है।

हार नहीं — आशा के अंकुर भी उगे हैं
संकट कितना भी गहरा हो, उसमें आशा के कुछ अंकुर जरूर उगते हैं। गंगा के मामले में ये अंकुर उभरते दिखे हैं:
गंगा डॉल्फिन की वापसी: 2024 की रिपोर्ट के अनुसार देश में लगभग 6,327 गंगा डॉल्फिन हैं। 28 नदियों के 8,507 किलोमीटर के सर्वेक्षण में डॉल्फिन मिलीं और पहली बार बबई और बागमती नदियों में भी इनका पता चला — जो नदी की सेहत का उत्साहवर्धक संकेत है। जनवरी 2026 में देश का पहला डॉल्फिन बचाव रोगी वाहन भी शुरू हुआ।
घड़ियाल और कछुए: वैज्ञानिक सर्वेक्षणों में 3,037 घड़ियाल दर्ज हुए। 6,800 से अधिक जलीय जानवर बचाए गए; 893 घड़ियाल, 711 कछुए और 1,899 कछुए के बच्चे नदी में छोड़े जा चुके हैं।
मछलियों का पुनरुद्धार: गंगा में 215 मछली प्रजातियां दर्ज हुईं और 2.05 करोड़ मछली के बीज (महाशीर, हिल्सा सहित) नदी में छोड़े गए।
हरियाली: 33,024 हेक्टेयर में वनरोपण हुआ (करीब 414 करोड़ खर्च); सात गंगा जैवविविधता उद्यान विकसित हुए; उत्तर प्रदेश में 20 आर्द्रभूमि अधिसूचित की गईं।
जन भागीदारी: 5,500 से अधिक ‘गंगा प्रहरी’ 113 जिलों में सक्रिय हैं।
अविरलता: अक्टूबर 2018 से न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह मानक लागू किए गए, जिनकी निगरानी केंद्रीय जल आयोग करता है। न्यूनतम इतना पानी रहे कि नदी बहती रहे — यह अविरलता की कोशिश है।
ये कागजी नहीं, जमीनी उपलब्धियां हैं। पर इन्हीं के बगल खड़े हैं वे आंकड़े भी, जो बताते हैं कि अधूरे काम, ठप एसटीपी और अरबों गुना बैक्टीरिया अब भी बने हुए हैं।

समाधान का रास्ता
समाधान का रास्ता एक नहीं, अनेक मोड़ों के साथ आगे बढ़ता है। और सबसे पहला सच यही है कि गंगा को पाइप, पंप और प्लांट से ही नहीं, जीवन-दर्शन से बचाना होगा।

1- जो बना है, उसे चलाइए। पहला और सबसे ‘पानीदार’ काम है — बने हुए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट को ठीक से चलाना। देश में 23 ऐसे प्लांट ठप हैं। इन्हें चालू करना और हर घर को सीवेज कनेक्शन देना — बिना यह किए कोई भी नया प्लांट गंगा नहीं बचा सकता। मलजनित भार तभी खत्म होगा, जब शहर का हर घर अपना गंदा पानी सीवेज नेटवर्क से जोड़ेगा, न कि सीधे नाले से।

2- प्रवाह (अविरलता) को बनाए रखिए। बांधों और बैराजों के चलते जल-प्रवाह के टुकड़े हो गए। पर्यावरणीय प्रवाह मानक सख्ती से लागू करने होंगे और नदी के बाढ़-क्षेत्र को अतिक्रमण से मुक्त रखना होगा — क्योंकि जब पानी ही कम होता है, तो बचा हुआ प्रदूषण ज्यादा घातक बनता है।

3- कारखानों पर कड़ी नजर। औद्योगिक अपशिष्ट को नदी तक जाने से रोकने के लिए कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) की संख्या बढ़ानी होगी और ऑनलाइन निगरानी सख्त करनी होगी। जाजमऊ (कानपुर) और मथुरा के सीईटीपी पूरे हुए हैं — ऐसे और चाहिए।

4-आस्था और विज्ञान का मेल। हम आरती में पानी में खड़े होते हैं पर यह नहीं पूछते कि पानी साफ है या नहीं। धार्मिक परंपरा और वैज्ञानिक सफाई में कोई टकराव नहीं होना चाहिए — फूल-मालाओं और पूजा-सामग्री के लिए अलग संग्रह व संसाधन की व्यवस्था एक नई शुरुआत होगी। जिस आस्था के नाम पर गंगा पूजी जाती है, उसी आस्था से उसकी सफाई भी संभव है।

5- कचरे का समग्र प्रबंधन। ठोस कचरा — प्लास्टिक, मलबा, हर तरह का गंदा — नदी तक न पहुंचे, इसके लिए शहरों में कचरा अलगाव (सोर्स सेग्रीगेशन) और प्रबंधन को बुनियादी बनाना होगा। कैग ने बताया कि सात सालों में एक भी शहरी निकाय को ठोस कचरा प्रबंधन के लिए अधिकृत नहीं किया गया — यह नदी की नहीं, हमारी नाकामी है।

6- जन-आंदोलन बनाइए। गंगा की सफाई सिर्फ सरकार का काम नहीं है। नदी से जुड़े समुदाय — मल्लाह, किसान, कारोबारी, धार्मिक नगरों के लोग, गंगा प्रहरी — इनकी भागीदारी बिना कोई भी परियोजना आधी रह जाती है। गंगा की रक्षा को ‘जन आंदोलन’ बनाना ही सबसे बड़ा समाधान है। ‘गंगा उत्सव’ जैसे आयोजन महज उत्सव न रहकर जागरुकता का मंच बनने चाहिए।

7- खर्च पर पारदर्शिता। जब सरकार 492 परियोजनाओं पर 40,000 करोड़ से अधिक खर्च का दावा करती है, तो जनता का हक है कि हर रुपये का हिसाब हो। स्वीकृति से ज्यादा ‘उपयोग’ को निशाना और जवाबदेह बनाना होगा — क्योंकि आज स्वीकृति ज्यादा और उपयोग कम है, यही सबसे बड़ी खामी है।

उम्मीद की आस
हर सुबह उसी हरिद्वार के घाट पर एक बूढ़ा बैठा होता है, जो कहता है — “मैंने इस नदी को अपने बचपन में देखा है। पानी इतना साफ था कि देखकर मन ठंडा हो जाता था। आज उसी नदी में हम खड़े होकर आरती करते हैं, पर आंखें बंद किए रहते हैं। क्या उसकी चीख हम सुन सकते हैं?”

गंगा केवल एक नदी नहीं है। वह इस देश की आत्मा है। जो नदी पाप-मोचन के लिए उतरी थी, उसे हमने अपने पापों का बोझ उठाकर दबा दिया है। जब तक इस आत्मा का गला घुटता रहेगा, तब तक कोई भी करोड़ों का अभियान पूरा नहीं माना जा सकता।

हां, आशा की किरण है — डॉल्फिन लौट रही है, घड़ियाल का संरक्षण चल रहा है, उत्तराखंड का खंड प्रदूषण सूची से हटा है, और 4,263 एमएलडी की उपचार क्षमता तैयार हुई है। पर यह सब महज आधा रास्ता है।

गंगा को बचाना कोई विकास परियोजना नहीं, बल्कि एक तपस्या है। हजारों करोड़ रुपये की यह तपस्या तभी सार्थक होगी, जब एसटीपी चलेंगे, घर जुड़ेंगे, नाले रुकेंगे, और हम अपनी आरती की लौ में आंखें खोलकर उस नदी को पहचानेंगे — जहां जल इतना निर्मल हो कि उसे परखने की जरूरत ही न पड़े।

भगीरथ ने एक बार गंगा को धरती पर उतारा। वह ‘भगीरथ-प्रयास’ पूरा हो चुका। अब असली तपस्या हमारी है — उसे उसी निर्मलता और अविरलता में लौटाने की, जिसके लिए वह एक बार स्वर्ग से उतरी थीं। क्या वह दिन लौटेगा? यह हम पर है। आज जो पैसा बह रहा है, वह कोई सिलसिला नहीं — वह हमारे पूर्वजों के उस विश्वास की पूंजी है कि जो नदी जन्म देती है, उसे मरने नहीं देना चाहिए। तब तक… गंगा बहती रहेगी। और हम सुनते रहेंगे उसकी चुपचाप बहती चीख — जल ही जीवन है। पर जीवन तभी है, जब जल निर्मल और अविरल हो।

नोटः इस रिपोर्ट के मुख्य स्रोत
वाल्मीकि रामायण (बालकांड), महाभारत, भागवत पुराण, शिव पुराण — गंगा अवतरण/भगीरथ कथा (अध्याय 1 का पौराणिक संदर्भ)
भारत सरकार, लोकसभा/राज्यसभा प्रश्न-उत्तर (सत्र 2025-26) — नमामि गंगे मिशन-II, 219 सीवेज परियोजनाएं, 4,263 एमएलडी क्षमता
एनएमसीजी— ‘नमामि गंगे कार्यक्रम’ आधिकारिक वेबसाइट; पीआईबी प्रेस विज्ञप्तियां
पीआईबी (मार्च 2025) — 492 परियोजनाएं, ₹40,121.48 करोड़; 307 पूर्ण
सीएजी (कैग) उत्तराखंड नमामि गंगे ऑडिट रिपोर्ट (2025) — जल गुणवत्ता, फीकल कोलिफॉर्म 24×10¹¹, वनीकरण खर्च
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च — ₹30,096 करोड़ स्वीकृत, ₹18,842 करोड़ खर्च (63% उपयोग)
डाउन टू अर्थ हिंदी (जुलाई 2025/फरवरी 2026) — CAG विश्लेषण, बजट 2026-27
खबर गांव (अगस्त 2026) — 219 सीवेज परियोजनाएं, 23 ठप एसटीपी; ₹26,111.86 करोड़ बजट, ₹21,339.57 करोड़ जारी
दैनिक जागरण (मई 2026) — कैग: देवप्रयाग के बाद आचमन-अनुचित; ऋषिकेश-हरिद्वार स्नान-श्रेणी
सीएनबीसी टीव18 / न्यूज 18 / स्वराज / एनबीएमसीडब्ल्यू— बजट 2026, 2025-26 उपलब्धियां, डॉल्फिन/घड़ियाल/वनरोपण आंकड़े

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