बांदा के लोगों को केन नदी के संदर्भ में बाबू केदारनाथ अग्रवाल बहुत याद आते हैं।

‘केदार की’ कविताओं में ‘केन’ और बांदा के ‘उत्खनन का ‘आज’

वीरेन्द्र गोयल, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार विजेता स्मृतिशेष कवि केदारनाथ अग्रवाल की कर्मभूमि बांदा से

जो रेत कवि की हथेली में थी
बांदा जिले का कोई भी बाशिंदा जब आज केन नदी के किनारे खड़ा होता है, तो उसे सबसे पहले एक सवाल सालता है — जिस रेत के लिए हमारे महाकवि ने कभी कहा था कि वह “होड़ राज्य-श्री से लेती है”, वही रेत आज ट्रकों में बंद होकर कहां जा रही है?

बाबू केदारनाथ अग्रवाल — 01 अप्रैल, 1911 को बांदा जिले के कमासिन गांव में जन्मे। 22 जून, 2000 तक कलम चलाने वाले इस जनकवि का बांदा और केन से जो विलयन था, उसे बांदा के लोग आज भी जीते हैं। पेशे से वकील, लेकिन उनके वकालतनामे में जितना हक खेतिहर, मजदूर, मछुआरा और नदी का था, उतना किसी वकील के बाजू में नहीं होता। प्रगतिशील काव्यधारा के इस ध्वज-वाहक को साहित्य अकादमी सम्मान मिला — पर उनका सबसे बड़ा सम्मान यह था कि उन्होंने एक ‘छोटी सी नदी’ को कविता की जाति-परंपरा में अमर कर दिया।

उनकी कविता ‘बैठा हूं इस केन किनारे’ शब्द-शब्द में वही दृश्य रखती है, जो आज उत्खनन करने वाली मशीनें मिटा रही हैं-

बैठा हूं इस केन किनारे! दोनों हाथों में रेती है, नीचे, अगल-बगल रेती है होड़ राज्य-श्री से लेती है, मोद मुझे रेती देती है रेती पर ही पांव पसारे, बैठा हूं इस केन किनारे।

राज्य की संपदा से ‘होड़’ लेने वाली रेत — यानी कवि के प्रत्यक्ष अनुभव में यह रेत निजी संपत्ति नहीं, ‘लोक-सम्पदा’ की झलक थी। जो संपत्ति हर हाथ में मिट्टी बनकर, हर बच्चे की मुट्ठी में सपना बनकर रहती थी। आज उसी रेत से जुर्माना, घेराबंदी और गोली की खबरें बनती हैं — वह लोक-सम्पदा लुटेरों की निजी कमाई बन चुकी है।

‘पत्थर बैठा गुमसुम’ — और मशीनों का सन्नाटा
केदार बाबू की सबसे सूक्ष्म कविताओं में एक है — ‘केन किनारे, पत्थर बैठा गुमसुम’। कवि ने केन के किनारे बैठे पत्थर, हवा में लहराते सांप, पत्थर को चाटते पानी को एक ही शब्द में बांधा है:

केन किनारे, पत्थर बैठा गुमसुम। दिव्य मूक शांति का प्रतीक वह पत्थर, तिरछी घास में डूबता। शांत सांप हवा में लहराता, पानी पत्थर को चाटता, थर-थर कांपता यात्री देखता, सब गुमसुम।
(कविता ‘केन किनारे पत्थर बैठा गुमसुम’)

यह ‘गुमसुम’ शब्द ही केन की आत्मा है। हजारों वर्षों से केन का पत्थर इसी मौन में तपा है, सांप इसी शांति में हवा से बात करता आया है। आज उसी पत्थर को तोड़ने, उसी रेत को छलनी करने वाली पोकलेन का शोर — वह ‘गुमसुम’ शोर में बदल गया है। प्रकृति का सबसे गहरा वाक्य — मौन — अब मशीनों की गर्जना में उलझकर कोई शब्द नहीं बोल पाता।

‘आज नदी बिल्कुल उदास थी’ — भविष्य की पूर्व पीड़ा
केदार की एक और अद्भुत कविता है ‘आज नदी बिल्कुल उदास थी’ — जिसके बारे में साहित्य-मर्मज्ञ साफ कहते हैं कि यह नदी केन ही है-

आज नदी बिल्कुल उदास थी, सोई थी अपने पानी में, उसके दर्पण पर बादल का वस्त्र पड़ा था। मैंने उसको नहीं जगाया, दबे पांव घर वापस आया।

कितनी गहरी मानवता है इस ‘न जगाने’ में! नदी जब सोई हो, उसे जगाना क्रूर है। कवि दबे पांव लौट आता है — वह जानता है कि नदी की नींद में ही उसकी सेहत है। पर आज का बांदा उसी सोई नदी पर जेसीबी चढ़ा देता है। बेला-हथौहा, बीरा, श्मशान घाट — जहां नदी सबसे उदास होती है, वहीं सबसे जोर से खुदाई होती है। कवि ने नदी को ‘नहीं जगाया’; आज की मशीन ने उसे ‘जगाने’ के बहाने उखाड़ ही लिया।

‘नदी एक नौजवान ढीठ लड़की है’ — जिसकी जांघ को मशीनें काट रही हैं
केदार बाबू ने नदी को जवानी देकर चित्रित किया है-

नदी एक नौजवान ढीठ लड़की है जो पहाड़ से मैदान में आयी है जिसकी जांघ खुली और हंसों से भरी है… नदी म्यान से खींची एक तलवार है जो मैदान में लगातार चलती है जिसकी धार तेज और बिजली से भरी है। (कविता ‘नदी’)

‘ढीठ’ — यानी जिसे रोकना कठिन है। ‘तलवार’ — यानी जो कटती है तो कठोर। केदार की दृष्टि में नदी सजीव, उग्र और स्वच्छंद है। आज की तस्वीर उलटी है — जिस जांघ में हंस भरे थे, उसी में सक्शन पंप; जो तलवार बिजली की धार से चलती थी, उसी की म्यान अब खाली होती जा रही है। मैदान में जो नदी ‘अपनी’ रफ़्तार से चलती थी, वह आज मशीनों के आदेश पर रुकती-मुड़ती है। धार तेज थी — मगर अब तलवार ही नहीं रहेगी, तो धार तो बस इतिहास में रहेगी।

‘वह चिड़िया जो’ — जो नदी का दिल टटोलती थी
कबीर और केदार — दोनों ने नदी को जल-मोती की खान माना। केदार की कविता ‘वह चिड़िया जो’ में वह चिड़िया-
चोंच मार कर, नदी का दिल टटोल कर, जल का मोती ले जाती है…
यानी नदी केवल पानी नहीं — उसके अंदर ‘मोती’ हैं, जीवन है, अर्थ है। आज जब रेत-उत्खनन उसी नदी के तल से खुदाई करता है, तो वह सिर्फ रेत नहीं निकाल रहा — वह ‘दिल टटोलने वाली चिड़िया’ के लिए घोंसला ही उठा ले रहा है। जब चिड़िया नदी से मोती नहीं पाती, तो वह कहां जाएगी? बांदा की मछुआरिनें, जो अपना जाल केन में डालती थीं, आज उसी जाल को बेचने पर मजबूर हैं — डूबा हुआ जाल और सूखी नदी दोनों कविता करते हैं, पर उस दर्द में सुनने ‘वाला’ कहां है?

उत्खनन और केदार की चेतावनी
कवि केदार ने केवल सौंदर्य ही नहीं, संघर्ष भी लिखा। ‘फूल नहीं रंग बोलते हैं’ जैसे संग्रह बताते हैं — धरती, नदी, किसान — सब एक सूत्र में जुड़े हैं। बांदा में आज जो उत्खनन चल रहा है (छतरपुर-पन्ना-बांदा सीमा पर केन में पोकलेन, सक्शन पंप, अस्थायी बांध), वह केदार की कविताओं के प्रत्येक बिम्ब को उलट देता है-

केदार की केन………..आज की केन
हाथों में रेत, जो मोद देती………..ट्रकों में रेत, जो रंजिश देती है
पत्थर गुमसुम………..पत्थर चीखता है
सोई नदी को न जगाने वाला………..सोई नदी पर जेसीबी
हंसों से भरी जांघ………..सक्शन पंप की घूस
चिड़िया का जल-मोती………..मशीन का मोरंग-धन

यह सारणी ही पूरी रिपोर्ट है — कवि ने जिस रेत को ‘राज्य-श्री से होड़’ कहा, उसी रेत से आज राज्य खुद होड़ कर रहा है।

केन किनारे बैठा वह बच्चा
केदार बाबू ने लिखा था: “दुनिया के दुख-द्वन्द्व बिसारे मैं घूमूंगा केन किनारे”। उनके लिए केन शांति का मंदिर था — जहां जाकर वे समूचे विश्व का बोझ उतार देते थे। आज उसी खंदक पर खड़ा हर बुंदेलखंडवासी सोचता है- दुख-द्वन्द्व बिसारने के लिए हम कहां जाएं?

केदार की कविताएं आज भी उंगली पकड़कर केन तक ले जाती हैं — पर वहां अब ‘मोद देने वाली रेती’ की जगह ‘श्री की होड़’ करती मशीनें खड़ी हैं। जब तक हम केदार की कविता को सिर्फ पाठ्य-पुस्तक में नहीं, नदी के तट पर जीएंगे — तब तक वह “पत्थर बैठा गुमसुम” हमारी हर दलील का जवाब है।

जिसके हाथों में केदार की रेत थी, उसी के हाथों से आज रेत बिक जाती है। कवि ने रेत को हथेली में पकड़कर उसे ‘मोद’ कहा था; उत्खनन ने उसी रेत को ‘राजस्व’ कह दिया। हथेली से राजस्व तक की यात्रा में, रास्ते में मर गया नदी का वह रूप — जिसे केदारनाथ अग्रवाल ने ‘चादी जैसी दमकती रेत’ कहा था।

मां की पीर को कविता में बदलने वाला कवि आज हमारे बीच नहीं है। पर उसकी केन आज भी किनारे पर बैठकर इंतजार कर रही है — क्या कोई उसे फिर से ‘बैठा हूं इस केन किनारे’ सुना सकेगा?

यह लेख इन स्रोत की मदद से तैयार किया गया है
कविता ‘बैठा हूं इस केन किनारे’ — केदारनाथ अग्रवाल (हिन्दवी / हिन्दी साहित्य संगम पर उपलब्ध)
कविता ‘केन किनारे, पत्थर बैठा गुमसुम’ (‘अलोन द रीवर केन’) — केदारनाथ अग्रवाल; अनुवाद: इंद्रजीत सिंह, ‘पोएम ऑफ केदारनाथ अग्रवाल (प्रगति 1990)
कविता ‘आज नदी बिल्कुल उदास थी’ — केदारनाथ अग्रवाल; बुंदेलखंड न्यूज (2020), आज तक (2019), हिन्दवी
कविता ‘नदी’ — केदारनाथ अग्रवाल (काव्य-संग्रह से); स्वप्निल श्रीवास्तव का आलेख ‘केदार बाबू की केन नदी’
कविता ‘वह चिड़िया जो’ — केदारनाथ अग्रवाल
जीवनी-संबंधी तथ्य — विकिपीडिया (हिन्दी/अंग्रेजी)/ अमर उजाला काव्य; बुंदेलखंडन्यूजडॉटकॉम

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