मुकुंद/अभिमन्यु, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) नई दिल्ली का सातवां नदी उत्सव (24–26 सितंबर) का समापन हो गया। ‘शाश्वत यमुना’ के ध्येय वाक्य से गुंथे इस उत्सव में संकल्प — ‘यमुना के साथ एक हो जाना’ लिया गया। और वही सवाल, उत्सव मनाते हैं पर यमुना नदी क्यों नहीं साफ होती? नदी का 22 किलोमीटर का हिस्सा झाग से क्यों भरा रहता है?
पहले दिन उपराज्यपाल तरनजीत सिंह संधू ने ध्येय वाक्य (थीम) का उद्घाटन किया। आखिरी दिन सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि “नदी उत्सव की सच्ची पराकाष्ठा यमुना के साथ एक हो जाना और रिश्ता बहाल करने का सामूहिक संकल्प है।” बीच में कौंधा वही पुराना जलता प्रश्न — जिसे शोवना नारायण ने पहले ही दिन रखा- एक हाथ में फूल, दूसरे में कूड़ा — यह दोहरा रवैया क्यों? समापन की घंटी बजी। प्रशंसा मिली पर यमुना का सवाल अटका है।
उपराज्यपाल संधू ने उद्घाटन करते हुए कहा — नदियां जनमानस की आत्मा, संस्कृति और जीवन-धारा हैं। उन्होंने साफ किया कि प्रदूषण सिर्फ जलशोधन से नहीं रुकेगा। अनुपचारित सीवेज रोकना और शहरी-प्राकृतिक तंत्र का वैज्ञानिक प्रबंधन जरूरी है।
स्वामी अवधेशानंद गिरि ने यमुना को हिमालय-विकासनगर जैसी निर्मल बनाने और सशक्त टास्क फोर्स की मांग कर डाली।
शोवना नारायण ने सच को सामने रखा — नदी को पूजते हुए प्रदूषित करना, जब तक यह विरोधाभास नहीं टूटेगा, संरक्षण संभव नहीं। पहले दिन दिल्ली के वासुदेव घाट पर पेंटिंग-वर्कशॉप और ओडिसी-हवेली संगीत का संगम रहा।
दूसरे दिन डॉक्यूमेंट्री फिल्म फेस्टिवल, युवाओं व महिलाओं के लिए काव्य-लेखन, वाद-विवाद, स्केचिंग और कार्टून प्रतियोगिताएं — ‘द रिवर ऐज़ ऐन आर्काइविस्ट’ (नदी एक अभिलेख-रक्षक) की निगाह से ब्रह्मपुत्र, सिंधु, नर्मदा और यमुना की कहानियां सिनेमा के पर्दे पर उतारी गईं।
समापन: संकल्प और सम्मान
डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा — नदी को केवल भौगोलिक लैंडमार्क न मानें, जो पुल से नदी पार करता है, वह नदी को समझा नहीं (नरेश सक्सेना की कविता का संदर्भ)।
‘यमुना रिवर इनिशिएटिव (यारी)’ की अंबिका पंत ने स्कूलों से जोड़कर बच्चों को नदी से परिचित कराने की बात रखी — उन्होंने एक गंभीर भ्रम तोड़ा, “दिल्ली का प्रदूषित 22 किलोमीटर हिस्सा पूरी यमुना नहीं है।”
फिल्म फेस्टिवल पुरस्कार: प्रथम (संयुक्त) — देवांग सैकिया की ‘नॉयर कथा’ और बिश्वजीत दास की ‘ह्वेयर डिड अवर रिवर फ्लो टू’ (असमिया); द्वितीय — ‘व्हेन इट ऑल वेंट डार्क’; तृतीय — ‘बाराक: बियॉन्ड द मैप’।
विशेष सत्र: ‘टू सेंचुरीज़ ऑफ यमुना’ (बदलती धारा), नवीन वत्स की नदी-फोटोग्राफी वार्ता, और ग्रीन इंडिया फाउंडेशन का गहरा संदेश — ‘रिवर्स बिगिन ऑन लैंड’ (नदी जंगलों, मिट्टी, वर्षा और बाढ़-मैदानों से पैदा होती है; नदी बचानी है तो उसका पूरा पारिस्थितिक तंत्र बचाना होगा)।
अंत कुछ कटाक्ष भरा रहा — नाटक ‘यमुना ट्रैवल्स प्राइवेट अनलिमिटेड’ (निर्देशन फूलकुमारी), जिसने नदी के नाम पर चल रहे ‘कारोबार’ को आईने में दिखाया।
समापन भाषण का सबसे सार्थक पल यह रहा — जोशी ने बताया कि उनका जीवन अलग-अलग पड़ावों पर चंबल, बेतवा और केन नदी से जुड़ा रहा है — और ये तीनों यमुना की ही सहायक नदियां हैं।
यह संयोग नहीं, एक पूरा नक्शा है — वही केन-बेतवा, जिस पर बुंदेलखंड में 4,443 परिवारों के विस्थापन और 5,578 हेक्टेयर पन्ना टाइगर रिजर्व के सवालों के बीच डौंढान बांध की नींव पड़ चुकी है। वही चंबल, जो घड़ियालों की नर्सरी कहलाता है। अगर संस्कृति की बात करनी है तो इन्हीं सहायक नदियों की हकीकत — सूखते मोड़, गिरता जलस्तर, मलिन बस्तियों का सीवेज — उसी यमुना कथा की अगली पंक्ति है। उत्सव यहीं एक जीवंत पुल बन सकता था, पानी के लिए लड़ना और पानी को सिर्फ मानना, दोनों एक ही सूत्र पर पिरोए जाते।
“22 किलोमीटर” की चुनौती: अंबिका पंत सही कहती हैं कि प्रदूषित 22 किलोमीटर पूरी नदी का प्रतीक नहीं है — पर यही वह नूर है जिसके चलते पूरा देश यमुना को ‘गंदी नदी’ कहता है। क्या उत्सव में इसी 22 किलोमीटर के लिए कोई मापनीय लक्ष्य तय हुआ?
स्वामी अवधेशानंद गिरि की मांग पर उत्सव मौन रहा। केंद्र, दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश — चार सरकारों और कम से कम आठ एजेंसियों के बीच जिम्मेदारी तय होने का परिदृश्य धुंधला रहा।
जोशी ने ‘रिश्ता बहाल’ की बात कही पर एक सवाल अनुत्तरित रह गया, जब तक दिल्ली की सीवेज लाइनें नदी में खुलती रहेंगी, किसी भी रिश्ते की नींव पानी में डूबती रहेगी।
“इस बार यमुना” — यह थीम कितनी प्यारी है। डॉ. जोशी ने सही कहा — उत्सव की पराकाष्ठा यमुना के साथ ‘एक हो जाना’ है। पर ‘एक होना’ तब होगा, जब हर आरती के बाद भक्त नदी को कूड़ा-फूल सौंपकर नहीं, अपना सीवेज-कनेक्शन बंद करके घर जाएगा।
डिस्क्लेमरः इस रिपोर्ट में हिन्दुस्थान समाचार, एएनआई, न्यूज 8टुडे और अमर उजाला में छपी खबरों की मदद ली गई है। साथ ही आईजीएनसीए की जारी विज्ञप्ति का भी सहारा लिया गया है।
