वाटर वॉच वर्ल्ड
आज विश्व नदी दिवस है। इस साल की थीम है ‘जंगल नहीं तो नदी नहीं, पानी नहीं तो जीवन नहीं।’ नदी ग्लेशियर से पहले जंगल से जन्मती है — वन कटा, तो प्रवाह थमा। कंक्रीट बिछी तो चित्रकूट का हश्र सामने है।
हर बरस 27 सितंबर को दुनिया भर के 100 से अधिक देशों में विश्व नदी दिवस मनाया जाता है। इस साल की थीम हमें सबसे गहरा पारिस्थितिक सच याद दिलाती है — नदी ग्लेशियर से पहले जंगल से जन्म लेती है। जहां वन कटते हैं, वहां मिट्टी बहती है, बाढ़-मैदान सूखते हैं और प्रवाह थमता है। यही वह समझ है, जो स्वामी अवधेशानंद गिरि ने नदी उत्सव में भी रखी — नदियां हिमरैणु और वृक्षों की जड़ों से जन्मती हैं।
भारत के लिए यह दिवस सिर्फ उत्सव नहीं, आत्मचिंतन का विषय है। जिस यमुना के 22 किलोमीटर हिस्से में ऑक्सीजन शून्य है, जिस चित्रकूट में जंगल कटे तो कंक्रीट ने नदी-मैदान घेर लिया और पानी ने फसलें जला दीं — वहां हर दिन ‘विश्व नदी दिवस’ की जरूरत है।
मार्क एंजेलो की प्रेरणा से 2005 में शुरू हुआ यह दिवस नदी को सिर्फ भौगोलिक चिह्न नहीं, जीवन का बुनियादी धागा मानता है। सबक एक ही है — जंगल बचाएं तो नदी बहेगी। नदी बहेगी तो पानी मिलेगा। पानी मिलेगा तो जीवन टिकेगा। नदी उत्सव की घंटी बजे या नदी दिवस हो — असल संकल्प नदी किनारे पेड़ लगाने, सीवेज रोकने और कंक्रीट हटाने में है।
शुभ विश्व नदी दिवस! 🌊🙏
