चित्रकूट का रामघाट। फोटो - इंटरनेट मीडिया

जल से जलता चित्रकूट… जहां अकाल ने कभी खेत झुलसाए, अब पानी ने जला दिया

मुकुंद/अभिमन्यु, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र

चित्रकूट के किसान रामचरण ने जून में गहने गिरवी रखकर अरहर बोई। सितंबर में उसी खेत को पानी ने जला दिया। नदी उफान पर है। धर्मनगरी ‘जल अकाल’ से कराह रही है। 76% ज्यादा बारिश। 80% फसल बर्बाद। एक महीने तक डूबा रहा रामघाट। …और नाविक-पुरोहितों के घरों के सूखे चूल्हे। जिस मंदाकिनी को हम माता कहते हैं, उसके रास्ते में हमने कंक्रीट बिछा दी — और नदी ने हमारे रास्तों पर पानी फेर दिया। रामचरण पूछता है, “पहले पानी नहीं था तो फसल प्यास से जल गई, अब इतना पानी आया कि उसने फसल को ही जला दिया। हम जाएं तो कहां जाएं?” जलवायु बदल चुकी है…। नीतियां वहीं हैं। आखिर कब तब सूखे और बाढ़ से बुंदेलखंड झुलसेगा

मंदाकिनी उफान पर है। आसमान से पानी बरस रहा है। धर्मनगरी ‘जल अकाल’ से कराह रही है। मानसून की करवट और एक किसान के डेढ़ बीघे की पुकार।
आप कहेंगे — नदी उफान पर है। बादल फट रहे हैं। फिर अकाल किस बात का? पर यही है इस कालखंड की विडंबना है। जिस भूमि ने वर्षों सूखे की तपन झेलकर सब्र करना सीखा, वही अब आसमान से गिरते पानी से दहक उठी है। रामघाट में नावें बंधी हैं। नाविक बेरोजगार हैं। पुरोहितों का कलश खाली हैं और खेतों में वही पानी भरा है, जिसकी एक-एक बूंद के लिए जून में किसानों ने गहने तक गिरवी रखे। यह सिर्फ बाढ़ नहीं — यह जलवायु का बदला हुआ चेहरा है।

डाउन टू अर्थ की हालिया रिपोर्ट बताती है कि इस साल बुंदेलखंड के मानसून ने अपना पुराना चरित्र त्याग दिया है। रुक-रुक कर तीन महीने तक बरसने वाली बारिश अब कुछ ही दिनों में फट पड़ती है — जैसे आसमान को पता हो कि उसके पास सिर्फ इतना ही समय है, और उसने सब कुछ एक साथ उड़ेल दिया।

आईएमडी के आंकड़े बेरहम हैं। अगस्त के आखिरी दिनों से 25 सितंबर तक चित्रकूट में सामान्य से 76% अधिक बारिश हुई। जिन खेतों में जून-जुलाई में धूल उड़ रही थी, वही अब अगस्त-सितंबर में हफ्तों पानी में डूबे रहे। वैज्ञानिक इसे ‘गीला सूखा’ (वेट ड्राउट) कहते हैं — जहां मौसम किसान को संभलने का एक दिन भी नहीं देता। न बुवाई का समय, न सिंचाई का, न कटाई का। सब कुछ बिखरा हुआ। रामचरण इस बिखराव को अपने गांव के खेत के किनारे बैठकर देख रहा है — और उसकी आंखों में सिर्फ बरसात का पानी नहीं, आंसू भी हैं।

भौगोलिक सच यह है कि रामघाट का पूरा इलाका मंदाकिनी, सरयू और पयस्विनी तीन पवित्र नदियों का प्राकृतिक बाढ़-मैदान (फ्लडप्लेन) है। यहां पानी का होना तय है — लेकिन नीति ने फैसला किया कि इसी जल-क्षेत्र में होटल बनेंगे, पक्के निर्माण उठेंगे, दुकानें सजेंगी। जो नदी सदियों से अपनी यादों को सहेजती आई है, हमने उसके आगे-पीछे दीवारें खड़ी कर दीं।

नतीजा? 29 अगस्त से 25 सितंबर तक — पूरे एक महीने रामघाट भीषण जलमग्नता में घिरा रहा। सीढ़ियां दिखनी बंद हो गईं। आरती के थाल सपाट रहे और नदी के उतरने का इंतजार करते-करते लोग थक गए।

नदियां कभी गुस्सा नहीं करतीं — बस अपना रास्ता ढूंढती हैं। और जब हम उनके रास्ते में कंक्रीट बिछाते हैं, तो वे हमारे रास्तों पर पानी फेर देती हैं। चित्रकूट में इन्हीं तीन हफ्तों में हजारों लोगों ने यह सबक अपने जिंदा घरों में सीखा। चित्रकूट की अर्थव्यवस्था कामतानाथ के दर्शन और मंदाकिनी के घाटों पर टिकी है। परिक्रमा, अर्घ्य, आरती — इन्हीं से यहां के जनमानस का चूल्हा जलता है। लेकिन एक महीने के जलमग्न दौर ने इस रीढ़ को तोड़ दिया।

रामघाट की सीढ़ियां पानी में डूबी तो नावें किनारे बंधी रहीं। जिस मंदाकिनी पर पितरों की अस्थियां बहाने का सौभाग्य मिलता है, वही आज नाविक की आजीविका बनाम बनकर सूखी पड़ी है।
रामचरण ने बताया, “एक महीने से चूल्हा ठीक से नहीं जल रहा” — वही दर्द यहां हर पंडित के आंगन में है। अनुष्ठान ठप मतलब रोजी-रोटी ठप। यही नहीं माला-प्रसाद, पूजा-सामग्री और होटलों के शटर गिरे हैं। जो सब कुछ नदी से मिलता था, वही नदी का पानी अब उनके दरवाजे बंद कर रहा है। तीर्थ की आस्था और तीर्थ के व्यापार — दोनों एक ही डूब में मिल गए।

जून में जब पूरा बुंदेलखंड तप रहा था तब रामचरण ने पत्नी के गहने गिरवी रखकर कर्ज लिया। डीजल पंप से मंदाकिनी का ही पानी खींचकर अरहर और तिल की बुआई की। यानी जिस नदी को वह पूजता है, उसी के पानी से उसने फसल की उम्मीद बोई। सितंबर आया तो बारिश भी आई — लेकिन ऐसी बरसात, जैसी उसने कभी देखी नहीं थी। मंदाकिनी उफान पर आई और रामचरण का पूरा खेत जलमग्न हो गया। जब पानी उतरा तो खेत के किनारे बैठकर रामचरण रो पड़ा। हरी-भरी अरहर काली पड़ चुकी थी।

रामचरण के रुंधे गले से निकली यह पंक्ति इस पूरे संकट का सार है, “साहब, पहले पानी नहीं था तो फसल अकाल से जल गई। अब इतना पानी आया कि उसने फसल को ही जला दिया। नदी के घाट पर पूजा कराने वाले मेरे पुरोहित भाई के घर में भी एक महीने से चूल्हा ठीक से नहीं जल रहा। हम जाएं तो कहां जाएं?” कहां जाएं — यह सवाल सिर्फ रामचरण का नहीं है। यह पूरे चित्रकूट और पूरे बुंदेलखंड का है।

तालाब जो दम तोड़ते हैं, समाज जो सोता है
जिस समय सबसे ज्यादा जरूरत थी अपने पुरखों के जल-स्रोतों की, उसी समय वे खुद मदद के मोहताज थे। चंदेलकालीन तालाब सदियों बारिश की हर बूंद को सहेजते रहे — आज या तो अतिक्रमण का शिकार हैं, या सिल्ट (गाद) से पाटे जा चुके हैं। हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए नागरिक सरकार की ओर देखता है, जबकि पुरखों की यह परंपरा हर घर की छत, हर आंगन का गड्ढा, बारिश का पानी पीने योग्य बना देता था। जल संचयन (वॉटर हार्वेस्टिंग) की संस्कृति को हमने कब्र के पार रख दिया है। पानी बचाया ही नहीं जाता, केवल मांगा जाता है।
जब समाज खुद सोया हो, तो व्यवस्था के सोने में कोई नई बात नहीं। और वह भी सोई है। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट कहती है कि बाढ़ आने पर विभाग का काम सिर्फ राहत सामग्री बांटना और किसान की शिकायत पर सर्वे के आदेश जारी करना रह गया है। जल प्रबंधन की दर्जनों योजनाएं कागजों पर चल रही हैं वाटरशेड से लेकर जलशक्ति अभियान तकपर धरातल पर सुस्ती साफ है।

जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक चुनौती का सामना करने के लिए दीर्घकालिक विजन तो दूर, अगले मानसून की तैयारी की योजना तक का दृश्य धुंधला है। जो विभाग पेपर पर ‘जल संरक्षण’ के नारे लिखता है, वही नदी की जरूरत के समय सिर्फ फाइलें पलटता नजर आता है।

चित्रकूट का संकट… हमें तीन जरूरी सच बताता है
समस्या सिर्फ पानी की कमी या अधिकता नहीं — समस्या इनसानी दखल का संतुलन बिगड़ जाना है। फ्लडप्लेन में बसावट, तालाबों पर कब्जा, और जल-चेतना का विस्मरण — इन्हीं ने ‘बरबादी’ को आमंत्रित किया।
जलवायु-अनुकूल खेती (क्लाइमेट रेजिलिएंट एग्रीकल्चर) अब विकल्प नहीं, विवशता है — ऐसी किस्में, ऐसी सिंचाई, ऐसी बुवाई जो मौसम की करवटों के बीच भी फसल को जिंदा रख सके। जब तक किसान की फसल मौसम की मनमर्जी की मोहताज रहेगी, रामचरण की कहानी हर साल नए नाम से दोहराई जाएगी।
सबसे पहले नदी का रास्ता खाली करना होगा — जो जल-क्षेत्र नदी का है, वह नदी को लौटाना होगा। तालाबों की साफ-सफाई, अतिक्रमण हटाना और वॉटर हार्वेस्टिंग को हर गांव, हर शहर की नीति बनाना होगा।
रामचरण का डेढ़ बीघा खेत और रामघाट की डूबी सीढ़ियां हमसे वह प्रश्न पूछ रही हैं, जो कभी नदी के किनारे बैठकर हमें भी एक बार सोचना चाहिए…

हम नदी को मां कहते हैं, तो उसकी पीठ पर कंक्रीट क्यों बिछाते हैं? हम मंदाकिनी से आशीर्वाद लेते हैं, तो उसके बाढ़ को आपदा कहकर दर-बदर क्यों होते हैं? क्या अगली बार धर्मनगरी में बारिश के बाद ‘भीगी फसल’ की चिंता से पहले ‘ पानी बचाओ’ की नीति होगी?

अगर नहीं तो जब-जब सूखा पड़ेगा, जब-जब बाढ़ आएगी तब तक ऐसे तमाम रामचरण कहेंगे — पहले ‘अकाल ने जलाया’। अब बाढ़ के ‘पानी ने जला दिया।’

पानी तो बेकसूर है। दोषी हम हैं — जिन्होंने मौसम बदल दिया और बदला हुआ मौसम सिर्फ दोषारोपण से नहीं रुकेगा।

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