दिल्ली में यमुना नदी पर झाग की मोटी चादर। फोटो - इंटरनेट मीडिया

नदी नाद… धरती की जीवन धाराओं का चरम संकट और उद्धार का रास्ता

मुकुंद/अभिमन्यु, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र

एक बूढ़ी दादी अपने गांव की नदी के किनारे बैठी है। उसकी आंखें सूखी हैं और पास की नदी भी। वह बोली — “मेरे जमाने में यह नदी मुझसे बड़ी रही है। मैंने इसमें नहाया। इसी का पानी पिया। इसी के किनारे अपने बच्चों के संस्कार किए। आज मैं इसे कहां देखती हूं? यह तो केवल एक याद रह गई है।”

जल ही जीवन है — यह कहावत हम सबने हजार बार सुनी है। पर हम में से कितने लोगों ने कभी यह सवाल किया है, जिस स्रोत से जीवन मिलता है, उस जीवन धारा का अपना जीवन कैसा है? नदियां, जिन्हें हम आदिकाल से सभ्यता का पालना कहते आए हैं, आज पूरी दुनिया में एक ऐसे संकट से जूझ रही हैं जिसकी गहराई शायद ही कोई पूरी तरह जानता हो। यह संकट इतना विराट है कि इसे जानकर किसी भी संवेदनशील मन की आंखें नम हुए बिना नहीं रह सकतीं। और सबसे बड़ा प्रश्न यही उभर कर आता है — आखिर दुनिया की कितनी नदियां इस संकट के दलदल में धंस चुकी हैं और उन्हें निकालने का रास्ता क्या है?

वैश्विक आंकड़े, जो आंखों में आंसू ला दें
जब हम धरती की नदियों की सेहत को खंगालते हैं, तो विज्ञान हमारे सामने कुछ ऐसे चौंकाने वाले सच रखता है जिन्हें सुनकर कोई भी आह भर उठे।
केवल एक-तिहाई नदियां आज भी ‘मूल स्वरूप’ में हैं। दुनिया की 246 सबसे लंबी नदियों में से केवल 37 प्रतिशत — यानी तकरीबन हर तीन में से एक — आज भी अपने स्रोत से समुद्र तक बिना किसी रुकावट के बहती है। बाकी दो-तिहाई का प्राकृतिक प्रवाह बांधों, बैराजों और असंख्य संरचनाओं के जाल में फंसकर बंधक बन चुका है। कल्पना कीजिए। क्या होता अगर आपकी सांस की नली को आधे रास्ते में किसी चिमटे से दबा दिया जाए? नदी का दम भी वैसा ही घुट रहा है।

मीठे पानी में रहने वाली प्रजातियों का दर्दनाक पतन। बीते 50 वर्षों में दुनिया भर की मीठे पानी में रहने वाली मछलियां औसतन 84 प्रतिशत घट चुकी हैं। यह गिरावट भूमि या समुद्र के पारिस्थितिकी तंत्र की तुलना में कहीं ज्यादा भयावह है — मानो किसी परिवार के सारे बच्चे एक-एक करके दुनिया से चले गए हों। हर तीन मीठे पानी के स्रोत में से एक विलुप्ति के कगार पर है और हर तीन मीठे पानी की मछलियों में से एक अब मिलती ही नहीं।

आर्द्रभूमि का क्षरण जीवन के प्रसूति गृह का खाली होना है। 1970 के बाद से दुनिया की एक-तिहाई आर्द्रभूमि धरती के मुंह से गायब हो चुकी है। और ये जंगलों की तुलना में तीन गुना तेजी से सिमट रही हैं। नदियों से जुड़ी ये दलदली धरती लाखों प्राणियों की मांओं की तरह हैं — और इन मांओं के घर लूट लिए गए हैं।

हजारों बांधों का जाल है। इसने नदियों को कैद कर लिया। धरती पर आज लगभग 60,000 बड़े बांध खड़े हैं और 3,700 से अधिक नए बड़े जलविद्युत बांध या तो बन रहे हैं या योजना के कागजों पर बैठे हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि ये सारे बांध बन गए तो दुनिया की 2,60,000 किलोमीटर से अधिक मुक्त बहती नदियां खत्म हो जाएंगी — यानी धरती की परिधि के छह गुना से भी लंबा सफर जो आज स्वतंत्र है, कल बंदी बन जाएगा।

ये आंकड़े सिर्फ विज्ञान की कोरी गणना नहीं हैं। नदियां केवल पानी का बहाव नहीं, बल्कि वैश्विक खाद्य उत्पादन के एक-तिहाई की रीढ़ हैं। करोड़ों मछुआरे, किसान, कारीगर और परिवार इन्हीं पर टिके हैं। संयुक्त राष्ट्र का अध्ययन बताता है कि मीठे पानी और आर्द्रभूमि का कुल आर्थिक मूल्य सालाना 58 ट्रिलियन डॉलर है। यह पूरे विश्व के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 60 प्रतिशत। इतनी विराट कीमत की धरोहर को हम चुपचाप जलाते रहें, यह केवल एक पारिस्थितिकीय भूल नहीं, बल्कि एक विशाल मानवीय त्रासदी होगी।

भारत का परिदृश्य में, थोड़ी राहत, गहरे जख्म
भारत की धरती की ओर मुड़ें तो यहां की तस्वीर एक साथ उत्साह और चिंता दोनों जगाती है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के 2025 के ताजे आंकड़ों के मुताबिक, भारत में प्रदूषित नदी-खंड की संख्या 296 है, जो 271 नदियों में फैली हुई है और यह 32 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को छूती है।
यह संख्या 2018 में 351 थी। 2022 में घटकर 311 और अब 296 हो गई है — सात साल में करीब 16 प्रतिशत की गिरावट। राहत देने वाली बात यह है कि असम, गोवा, गुजरात, केरल, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में 149 प्रदूषित खंड अब प्रदूषित नहीं रहे। पर चिंता यह है कि 85 खंड आज भी जस के तस खड़े हैं, और इनमें से 25 सबसे गंभीर ‘प्राथमिकता-1’ श्रेणी के हैं।
सीबीसीबी करीब 2,265 निगरानी स्टेशनों के जरिए नदियों की गुणवत्ता पर नजर रखता है और 37 नदी-खंड ‘सर्वाधिक प्रदूषित’ (प्राथमिकता-1) की श्रेणी में हैं, जहां बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) 30 मिलीग्राम/लीटर से भी अधिक है — यानी वहां ऑक्सीजन की कमी से प्राण फूंकने वाली नदी खुद सांस नहीं ले पा रही।

राज्यों की बात करें, तो महाराष्ट्र सबसे ज्यादा (54 प्रदूषित खंड) वाला राज्य है। उसके बाद केरल (31), मध्य प्रदेश और मणिपुर (18-18), और कर्नाटक (14) आते हैं। सबसे गंभीर ‘प्राथमिकता-1’ खंड तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में सबसे अधिक हैं।

यमुना के पल्ला-असगरपुर खंड (दिल्ली) की तस्वीर कौन भूल सकता है। यहां नदी पर झाग की चादर ऐसी चढ़ी रहती है मानो सर्दी में धुंध छाई हो — सिवाय इसके कि यह धुंध नहीं, नदी की चीख है। साबरमती (अहमदाबाद), चंबल का नागदा-गांधीसागर खंड (मध्य प्रदेश), तुंगभद्रा और सारभंगा — ये कुछ ऐसे नाम हैं जो देश की प्रमुख नदियों की व्यथा बयां करते हैं। कावेरी, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा जैसी हमारी पवित्र और विराट नदियों के भी खंड इस दर्द में शामिल हैं।

संकट की जड़ें — दर्द इतना गहरा क्यों?
नदियों का यह रोना किसी एक वजह से नहीं फूटा। यह अनेक तहों में गुंथा हुआ महासंकट है, जिसकी हर परत एक घाव छुपाए है।

पहली परत: अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक जहर। दुनिया भर में नदियों के प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह यही है। सीपीसीबी के अनुसार, देश में 60 प्रतिशत से अधिक अनुपचारित सीवेज हर दिन सीधे नदियों में उड़ेला जाता है। रसायन, चीनी, कागज और चमड़े के कारखानों का विषैला अपशिष्ट इस घाव को और भी हरा रखता है।

दूसरी परत: कृषि का जहरीला पसीना। दुनिया भर में मीठे पानी के प्रदूषण का सबसे विशाल स्रोत कृषि ही है। उर्वरक और कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग नदियों में नाइट्रोजन और फास्फोरस पहुंचाता है, जिससे नदी में शैवाल पनपकर ऑक्सीजन चूस लेते हैं। ताज्जुब की बात यह है कि कृषि मानव के उपयोग में आने वाले मीठे पानी का 70 प्रतिशत से अधिक खपत करती है — और यही नदियों की सबसे बड़ी प्रदूषक भी है। यानी जो हाथ नदी को पालता है, वही उसे जहर भी देता है।

तीसरी परत: बांधों की कैद है। प्राकृतिक प्रवाह को रोककर बांध नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं। वे मछलियों के प्रवास को रोकते हैं। जलोढ़ मैदानों और डेल्टा के लिए जरूरी तलछट को रोक लेते हैं, और नदी की जैविक समृद्धि को नष्ट करते हैं।

चौथी परत: रेत खनन और अतिक्रमण। नदियों से अवैध रेत खनन और किनारों पर दीवारें खींचकर अतिक्रमण ने नदी के प्राकृतिक बहाव को तोड़ा है, बाढ़ का खतरा बढ़ाया है और प्रदूषण को और गहराया है।

पांचवीं परत: जलवायु का रोष। अत्यधिक सूखा और भीषण बाढ़ के बीच झूलती दुनिया में जलवायु परिवर्तन ने नदियों के जलस्तर और प्रवाह को बेचैन कर दिया है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। वर्षा का मानदंड बदल गया है — और नदियां या तो सूख रही हैं या उफनकर विपत्ति बन रही हैं।

उद्धार का रास्ता — उम्मीद की किरण, ठोस कदम
संकट कितना भी गहरा हो, अंधेरा जितना घना, उतनी ही रोशनी की जरूरत होती है। और अच्छी खबर यह है कि रोशनी मौजूद है। नदियों को बचाने के रास्ते साफ हैं — बस इन पर दृढ़ता से चलने की जरूरत है। समाधान को तीन बड़े स्तंभों पर खड़ा किया जा सकता है:

पहला स्तंभ: प्रदूषण रोकना। यह सबसे पहला और सबसे कारगर कदम है। नगरों और कस्बों में अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र (एसटीपी) की क्षमता बढ़ानी होगी, ताकि अनुपचारित सीवेज नदी तक न पहुंचे। कारखानों के लिए ज़ीरो-लिक्विड-डिस्चार्ज (मतलब — बिल्कुल शून्य अपशिष्ट) के मानक लागू करने होंगे। कृषि में उर्वरक-प्रबंधन और बूंद-बूंद सिंचाई जैसी सटीक विधियों से नदी तक पहुंचने वाला अपवाह घटेगा।

दूसरा स्तंभ: नदी के प्राकृतिक प्रवाह की रक्षा। नए बांधों की योजना में नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ने वाले असर की पारदर्शी जांच अनिवार्य होनी चाहिए। अब जब सौर और पवन ऊर्जा सस्ती हो चुकी है, जलविद्युत पर पुरानी निर्भरता जरूरी नहीं रही। विशेषज्ञ कम-कार्बन, कम-लागत, कम-विवाद (LowCx3) ऊर्जा मॉडल अपनाने का सुझाव देते हैं, ताकि अनावश्यक बांधों से धरती की बची-खुची मुक्त नदियों को बचाया जा सके। संयुक्त राष्ट्र की ‘फ्रेशवाटर चैलेंज’ पहल का लक्ष्य 2030 तक 3,00,000 किलोमीटर खराब नदियों और 350 मिलियन हेक्टेयर आर्द्रभूमि को बहाल करना है। और भारत इस विराट अभियान का हिस्सा बन सकता है।

तीसरा स्तंभ: नदी-बेसिन का समग्र प्रबंधन और जनता की भागीदारी। नदी को उसका प्राकृतिक बाढ़-क्षेत्र वापस देना, अतिक्रमण हटाना, रेत खनन पर कड़ा नियंत्रण, और स्थानीय समुदायों को जल-संरक्षण का अधिकारी बनाना — ये दीर्घकालिक समाधान हैं। तरुण भारत संघ जैसे संगठनों ने साबित किया है कि समुदाय के नेतृत्व में जोहड़ और तालाबों के संरक्षण से तो सूखी हुई नदियां भी पुनर्जीवित हो उठी हैं। यह कोई कल्पना नहीं, धरती पर घटित सच है।

चौथा स्तंभ: जलवायु-अनुकूलन और अंतरराष्ट्रीय हाथ। नदियां सीमाओं को नहीं मानतीं — इसलिए अंतरराष्ट्रीय जल-बेसिन प्रबंधन और जलवायु-अनुकूलन नीतियां दोनों अनिवार्य हैं। ग्लेशियरों के पिघलने और बदलते वर्षा-मानदंड के खिलाफ पहले से तैयारी करना आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का वचन है।

संकट को क्या अवसर में बदलें
तो अब वापस उसी सवाल पर — आखिर दुनिया की कितनी नदियां संकट में हैं? सच्चा और सीधा उत्तर यही है कि दुनिया की अधिकांश प्रमुख नदियां आज किसी न किसी रूप में संकट से गुजर रही हैं — चाहे वह प्रदूषण हो। प्रवाह-विच्छेद, या जलवायु का कहर। भारत में 271 नदियों के 296 खंड प्रदूषित हैं, और वैश्विक स्तर पर दो-तिहाई लंबी नदियां अपना स्वाभाविक बहाव खो चुकी हैं। यह संकट सार्वभौमिक और बेहद गहरा है।

पर हर अंधेरी रात के बाद जैसे सुबह होती है, वैसे ही हर संकट अपने भीतर एक अवसर छिपाए होता है। जिस तरह भारत ने सात वर्षों में प्रदूषित खंड 351 से घटाकर 296 किए हैं, और जिस तरह दुनिया के कई देश नदियों को ‘राष्ट्रीय उद्यान’ घोषित कर उन्हें जीवनदान दे रहे हैं — उसी तरह यदि हम सचेत, विज्ञान-आधारित और जन-केंद्रित कदम उठाएं, तो यह संकट एक ऐसा मोड़ साबित हो सकता है जहां हम नदियों को उनका हक लौटा दें।

और हां, उस दादी की बात याद रखिए। अगर हम आज नदियों को वापस जीवन दे दें, तो आने वाली पीढ़ियां हमें ऐसे याद करेंगी जैसे हम अपने पुरखों को करते हैं — कृतज्ञता के साथ, कि इन्होंने धरती की जीवन-धाराओं को सूखने से बचा लिया।

नदियां केवल पानी का बहाव नहीं, सभ्यता और चेतना की धारा हैं। उन्हें बचाना सिर्फ पर्यावरण की जरूरत नहीं, बल्कि हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ियों के जीवन की रक्षा है। रास्ते हमारे सामने साफ बिछे हैं — जरूरत केवल इन्हें गंभीरता से, समय पर और मिलजुल कर तय करने की है।

स्रोत: विश्व वन्यजीव कोष, सीपीसीबी, केंद्रीय जल आयोग और संयुक्त राष्ट्र विश्व जल विकास रिपोर्ट की रिपोर्ट)

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