मुकुंद/अभिमन्यु, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र
पौराणिक ग्रंथों में चित्रूकट विंध्य के उत्तरार्द्ध में स्थित शांत क्षेत्र रहा है। मगर अब नहीं है। हर माह की प्रत्येक अमावस्या को यहां मेला अब भी लगता है। लाखों श्रृद्धालु पहुंचते हैं। सोमवती अमावस्या, दीपावली, शरद पूर्णिमा, मकर संक्रांति और राम नवमी यहां ऐसे समारोहों के विशेष अवसर हैं। कामदगिरि, हनुमान धारा, जानकी कुंड, लक्ष्मण पहाड़ी और देवांगना यहां के प्रसिद्ध धार्मिक पर्वत हैं। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के भौगोलिक खांचों में बंट चुके चित्रकूट में राम घाट का विशेष महत्व है। यहां घाट पर सरहदी रेखा का कोई मतलब नहीं रह जाता। इस घाट पर ही भगवान श्रीराम ने वनवास के समय अपने पिता का तर्पण मंदाकिनी, पयस्वनी और सरयू नदी के संगम पर किया था। अभिमन्यु भाई कहते हैं अब सिर्फ मंदाकिनी हैं। पयस्वनी और सरयू को जमीन निगल गई या आसमान खा गया? इस सवाल का जवाब कोई नहीं दे रहा।
वाकई पानी की इस दुनिया का तिलिस्म डरावना है। पयस्वनी और सरयू का विलोप चिंताजनक है। मंदाकिनी नदी में मिल रहे नालों के खिलाफ अभिमन्यु सामाजिक संचेतना का प्रयास कर रहे हैं। पद्मश्री उमाशंकर पाण्डेय से अपेक्षा है कि वह भी इस मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद करें। आखिर उन्हें यह नागरिक अलंकरण पानी पर ही मिला है। कामदगिरि परिक्रमा मार्ग पर पयस्वनी का उद्गम ब्रह्मकुंड है। मगर यहां से अब पयस्वनी आगे नहीं जाती। उसके प्राकृतिक बहाव में रुकावट खड़ी कर दी गई है। रामघाट पर जहां पयस्वनी का संगम मंदाकिनी में होता रहा है, उस मार्ग का प्रयोग लोग मूत्र और मल त्याग के लिए करते हैं।
वाल्मीकि रामायण और विभिन्न पुराणों में ब्रहकुंड का वर्णन है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, वनवास के दौरान भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण ने इस क्षेत्र में लंबा समय बिताया। एक प्रसंग के अनुसार, श्रीराम ने एक असुर का वध करने के पश्चात इसी कुंड में स्नान किया था। कर्वी शहर के युवा पर्यावरणविद् और कारोबारी महेंद्र गुप्ता कहते हैं कि ” पयस्वनी और सरयू के बिना रामघाट अधूरा है।” वह उत्तर प्रदेश चित्रकूटधाम कर्वी और मध्य प्रदेश के सतना जिला अधिकारी से आग्रह करते हैं कि पयस्वनी और सरयू को रामघाट पर लाने के लिए कोई चमत्कार नहीं करना है। इच्छाशक्ति और मठाधीशों के प्रभाव से परे होकर यहां फिर दोनों जलधाराओं को लाकर मंदाकनी की सूखी होती कोख को हरा भरा किया जा सकता है।
वो कहते हैं, ” मंदाकनी को सती अनुसुइया आश्रम से रामघाट के बीच कई जगह मारने की कोशिश की गई है। हजारों पेड़ों को काटा गया है। तटों पर कंक्रीट की ऊंची दीवार को बनाकर उसके मार्ग को संकरा कर दिया गया है।” सती अनुसुइया आश्रम के पास ही मंदाकिनी का उद्गम स्थल है। यह स्थान अत्रि मुनि की पत्नी माता अनुसुइया के कठोर तप, त्याग और त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) की परीक्षा के पौराणिक इतिहास के लिए प्रसिद्ध है।
ब्रह्म कुंड की देखरेख के लिए कभी-कभार पहुंचने वाले सत्य नारायण (सत्या भैया) काफी खोजने पर खोही में मिले। खोही यहां का एक मोहल्ला है। यह कामदगिरि की तलहटी पर है। वह कहते हैं, कोई कुछ ध्यान नहीं देता। कुछेक साल पहले तक ब्रह्म कुंड के आसपास दिनभर हिरण कुलांचे भरते थे। मोर नाचते थे। चीते दहाड़ते थे। रात को सियार हुआ-हुआ चिघ्घाड़ते थे। और अब… प्यासी कोयल और चिड़िया नजर आती हैं। पूरे परिक्रमा मार्ग पर लंगूर और बंदर नल की टूटियों से टपक रहे पानी से गला तर करने की कोशिश करते हैं। ब्रह्म कुंड में कुछ समय गुजारने वाले और यहां से करीब 50 किलोमीटर दूर देवल कुटी को आश्रय बना चुके त्यागी महाराज चित्रकूट के जल स्रोतों और पवित्र जल धाराओं के साथ हो रहे अन्याय से काफी दुखी हैं।
डूबते सूरज के साथ ब्रह्म कुंड से विदा लेते वक्त कई सवाल मन में उभरते रहे। सोचता रहा कहीं ऐसा तो नहीं कि मंदाकनी नदी का दूसरा नाम ही पयस्वनी नदी रहा हो। चित्रकूट में ज्यादातर स्थानीय नागरिक पयस्वनी को मां पैसुनी कहकर बुलाते हैं। गूगल में सवाल का जवाब तलाशा। वहां यही लिखा देखकर झुंझलाहट हुई। वह इसलिए कि जिस पैसुनी को गूगल मंदाकनी का दूसरा नाम बता रहा है, वह असत्य है। इस पैसुनी को देखने वाले हजारों लोग अभी भी चित्रकूट में हैं। 15 फरवरी 2022 की ‘न्यूज 18’ समाचार चैनल की वेबसाइट पर उपलब्ध रिपोर्ट पयस्वनी के अस्तित्व को मानने का पर्याप्त आधार देती है। इसमें कहा गया है कि कामदगिरि पर्वत से हजारों साल पुरानी जलधारा मिली है। यह जलधारा कोई साधारण जलधारा नहीं है। यह भगवान राम की आस्था से जुड़ी मंदाकिनी नदी की लाइफलाइन (जीवनरेखा) है। सतना जिले के चित्रकूट की दो पवित्र नदियां पयस्विनी और सरयू के अवैध अतिक्रमण से लुप्त होने पर एनजीटी ने भी सख्ती की है।
किवदंती है कि त्रेता युग में भगवान श्री रामचंद्र वनवास काल के दौरान चित्रकूट आए। उन्होंने सबसे पहले महाराजाधिराज श्री मत्यगजेंद्र नाथ स्वामी जी से आज्ञा ली। इसके बाद लगभग साढ़े 11 वर्ष यहां व्यतीत किए। यह भी कहा जाता है कि जब प्रभु राम ने अपने पिता का श्राद्ध समारोह किया तो सभी देवी-देवता शुद्धि भोज (परिवार में किसी की मृत्यु के तेरहवें दिन सभी सम्बन्धियों और मित्रों को दिया जाने वाला भोज) में हिस्सा लेने चित्रकूट आए। वे इस स्थान की सुंदरता से मोहित हो गए। इसलिए वे वापस प्रस्थान करने के लिए तैयार नहीं हुए। कुलगुरु वशिष्ठ भगवान राम की इच्छा के अनुसार रहने की उनकी इच्छा को समझते हुए विसर्जन (प्रस्थान) मंत्र को बोलना भूल गए। और सभी देवी-देवताओं ने इस जगह को अपना स्थायी आवास बना लिया और वहां हमेशा उपस्थित रहते हैं।
