यह बहुत पहले की बात है। फोटो - फाइल

चित्रकूट में पयस्विनी नदी को निगल गया विलायती बबूल!

मुकुंद, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र

क्योंकि चित्रकूट केवल तीर्थस्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और प्रकृति के अद्भुत संगम का प्रतीक है। कामदगिरि पर्वत के दक्षिणी भाग में स्थित ब्रह्मकुंड से निकलने वाली पयस्विनी नदी इसी प्राकृतिक और आध्यात्मिक विरासत का महत्त्वपूर्ण हिस्सा रही है।

सवालों का सवाल यह है कि आखिर पयस्विनी की धारा क्यों लुप्त हुई और इसे पुनर्जीवित करने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

पयस्विनी के सूखने के संदर्भ में विलायती बबूल की भूमिका पर चर्चा आवश्यक है। विलायती बबूल विदेशी प्रजाति है। यह शुष्क और अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों में तेजी से फैल सकती है। इसकी घनी झाड़ियां स्थानीय वनस्पतियों को विस्थापित कर सकती हैं और पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकती हैं।

देश के प्रमुख नदी कार्यकर्ता और लगभग चार दशक से चित्रकूट के जल स्रोतों के संरक्षण के लिए चिंतित अभिमन्यु भाई कहते हैं- श्रीराम की इस तपोवन में एक कहावत है – “कामदगिरि भए राम प्रसादा, अवलोकत अपहरत विषादा।”

चित्रकूट तपोवन पुनर्जीवन अभियान के संयोजक अभिमन्यु भाई कहते हैं, ”
आज उसी कामदगिरि के दर्शन से दुख बढ़ जाता है।” उन्होंने बताया, ”कुछ दिन पहले 17 अक्टूबर को लक्ष्मण पहाड़ी से ब्रह्मकुंड तक की हमारी ज्ञान यात्रा में यह सच्चाई सामने आई कि पयस्विनी जैसी सदानीरा नदियों को विलायती बबूल ने सुखाया है।”

वो कहते हैं, ”1985 में लक्ष्मण पहाड़ी के नीचे बड़े पैमाने पर जूली फ्लोरा यानी विलायती बबूल के बीज बिखेरे गए। सोच थी – जल्दी हरियाली आएगी। बंदर नहीं खाएंगे।”

उन्होंने दावा किया कि विलायती बबूल सब कुछ निगल जाती है। इसकी जड़ें 50 फीट नीचे जाकर पानी खींचती हैं। इसके पत्तों के जहर से गूलर, पाकड़, बरगद, जामुन नहीं उगते। इसके नीचे घास नहीं, मिट्टी बह जाती है।

अभिमन्यु कहते हैं, ” तभी इस यात्रा के दौरान 50 एकड़ में एक भी जल पोषक पेड़ नहीं मिला। आज लक्ष्मण पहाड़ी से ब्रह्मकुंड तक के बीहड़ इसी के कारण हैं। पहले यहां के गूलर-पाकड़ स्पंज की तरह पानी रोक कर ब्रह्मकुंड में छोड़ते थे। वही पयस्विनी बनती थी। हमने स्पंज हटा कर पम्प लगा दिया।”

वो जोर देकर कहते हैं कि विलायती बबूल हटाकर उसी जगह गूलर, पाकड़, जामुन, महुआ, बरगद का ट्रायल प्लॉट बनाना होगा। तब एक दिन कामदगिरि मुस्कुराएगा और पयस्विनी फिर बहने लगेगी।

waterwatchworld.com की इस पर लंबी तहकीकात में प्राप्त वैज्ञानिक अध्ययनों में इस प्रजाति के व्यापक फैलाव और भू-जल की स्थिति पर गहन संबंध उजागर हो चुका है। गुजरात में प्रकाशित 2025 के एक अध्ययन ने भी विलायती बबूल के फैलाव और भू-जल स्तर में गिरावट के संबंध का विश्लेषण किया है। उत्तर भारत में किए गए एक अन्य अध्ययन में भी विलायती बबूल के आक्रमण से स्थानीय जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव सामने आया है।

यह ऐसा तथ्य है, जिससे यह धारणा और मजबूत होती है कि ब्रह्मकुंड और पयस्विनी के जलग्रहण क्षेत्र में विलायती बबूल का अत्यधिक फैलाव ही मौजूदा परिदृश्य के लिए जिम्मेदार है।

हालांकि, अभी उपलब्ध प्रमाण यह सिद्ध नहीं करते कि पयस्विनी के सूखने का मुख्य या एकमात्र कारण विलायती बबूल ही है। इसलिए इस विषय पर भावनात्मक निष्कर्ष के बजाय वृहद वैज्ञानिक जांच आवश्यक है। जलधारा के मार्ग में जमा गाद और अन्य अवरोधों का भी वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए।
वर्षा और भू-जल में परिवर्तन पर पुराने वर्षा अभिलेखों को भी आधार बनाया जा सकता है।

इस स्थिति के लिए मानवीय हस्तक्षेप मसलन नदी किनारे के निर्माणों के प्रभाव का अध्ययन भी जरूरी हो जाता है। पयस्विनी को पुनर्जीवित करने के लिए समन्वित योजना की जरूरत है।

पहला चरण : वैज्ञानिक सर्वेक्षण
ब्रह्मकुंड से नदी के पुराने प्रवाह मार्ग तक विस्तृत सर्वेक्षण कराया जाए। विलायती बबूल के फैलाव का मानचित्र तैयार किया जाए और उन स्थानों को चिह्नित किया जाए जहां प्राकृतिक जलस्रोत प्रभावित हो सकते हैं।

दूसरा चरण : विलायती बबूल का नियंत्रित उन्मूलन

यदि वैज्ञानिक सर्वेक्षण से पता चलता है कि विलायती बबूल जलस्रोतों और देशज वनस्पति को नुकसान पहुंचा रहा है तो उसे चरणबद्ध ढंग से हटाया जाए। एक साथ बड़े क्षेत्र की वनस्पति साफ करने के बजाय छोटे हिस्सों में काम किया जाए, ताकि मिट्टी का कटाव और पारिस्थितिक क्षति न बढ़े।

तीसरा चरण : देशज वनस्पति की बहाली

विलायती बबूल हटाने के बाद स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल देशज वृक्षों, झाड़ियों और घास को बढ़ावा दिया जाए। इससे जैव विविधता और मिट्टी के संरक्षण में मदद मिल सकती है। प्रजातियों का चयन स्थानीय वन विभाग और पारिस्थितिकी विशेषज्ञों की सलाह से होना चाहिए।

चौथा चरण : जलग्रहण क्षेत्र का उपचार

वर्षा के पानी को रोकने और जमीन में उसका पुनर्भरण बढ़ाने के लिए उपयुक्त स्थानों पर छोटे जल अवरोध, सोख्ता संरचना तथा पारंपरिक जलस्रोत विकसित किए जाएं। किसी भी निर्माण से पहले जल वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए, ताकि नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित न हो।

पांचवां चरण : नदी मार्ग की रक्षा

पयस्विनी की भूमि का सीमांकन कर अतिक्रमण रोका जाए। पुराने प्राकृतिक मार्गों को पुनर्स्थापित किया जाए और नदी में जाने वाले गंदे पानी को रोकने के लिए उचित सीवेज प्रबंधन सुनिश्चित किया जाए।

छठा चरण : जनभागीदारी और निगरानी

स्थानीय नागरिकों, साधु-संतों, पर्यावरणविदों, वन विभाग, प्रशासन और जल विशेषज्ञों की संयुक्त समिति बनाई जाए। वर्षा, भू-जल स्तर, जलधारा की लंबाई और विलायती बबूल के फैलाव की नियमित निगरानी की जाए।

प्रशासन से अपेक्षा
जिला प्रशासन, वन विभाग, भू-जल विभाग और संबंधित राज्य सरकारों को संयुक्त रूप से पयस्विनी पुनर्जीवन की विस्तृत परियोजना तैयार करनी चाहिए। परियोजना में स्पष्ट समय सीमा, वैज्ञानिक आधार, बजट, उत्तरदायी विभाग और परिणामों की सार्वजनिक निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए।

केंद्र सरकार की लघु नदी पुनर्जीवन संबंधी पहल और मनरेगा के अंतर्गत जल संरक्षण के कार्यों से भी यह समन्वय किया जा सकता है। नदी की भूमि और प्राकृतिक जलस्रोतों की रक्षा को इस योजना का प्रमुख हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

पयस्विनी का पुनर्जीवन केवल एक नदी को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि चित्रकूट की प्राकृतिक विरासत, जैव विविधता और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने का संकल्प होना चाहिए।

पयस्विनी को बचाना केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज का साझा दायित्व है। आइए, आस्था को वैज्ञानिक दृष्टि से जोड़ें और चित्रकूट की इस ऐतिहासिक जलधारा को पुनर्जीवित करने के लिए एकजुट हो जाएं।

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