जबलपुर के भेड़ाघाट में रुद्र कुंड के पास नर्मदा तट पर एक संत गहन मुद्रा में। फोटो - waterwatchworld.com

कौन सुनेगा जबलपुर में संगमरमर की चट्टानों से टकराती नर्मदा की चीख

यह सुनकर रोना आता है कि मध्य प्रदेश के अमरकंटक के उद्गम से लेकर जबलपुर के घाटों तक ‘सबसे पवित्र’ कही जाने वाली नर्मदा नदी कई जगह दूषित हो चुकी है। दुर्भाग्य से जिस पवित्र जल से आचमन किया जाता है, उसी में घरों के शौचालयों का मल बहता है। नर्मदा खंभात की खाड़ी तक 1,312 किलोमीटर का सफर तय कर करती हैं । नर्मदा को न तो सिर्फ नदी कहा जा सकता है और न सिर्फ जलधारा। यह आस्था है। यह जीवन है और चार करोड़ लोगों के पीने का पानी भी। यही वह नदी है, जिसके तट पर श्रद्धालु आज भी रुद्र कुंड का जल ग्रहण करते हैं।

कहते हैं नर्मदा ने अपने प्रेमी शोणभद्र से धोखा खाने के बाद आजीवन कुंवारी रहने का फैसला किया। लेकिन क्या सचमुच वह गुस्से की आग में चिरकुवांरी बनी रहीं या फिर प्रेमी शोणभद्र को दंडित करने का यही बेहतर उपाय लगा कि आत्मनिर्वासन की पीड़ा को पीते हुए स्वयं पर ही आघात किया जाए। नर्मदा की प्रेमकथा लोकगीतों और लोककथाओं में अलग-अलग मिलती है। हर कथा का अंत कमोबेश वही कि शोणभद्र के नर्मदा की दासी जुहिला के साथ संबंधों के चलते नर्मदा ने अपना मुंह मोड़ लिया और उल्टी दिशा में चल पड़ी। सत्य और कथ्य का मिलन देखिए कि नर्मदा नदी आज भी विपरीत दिशा में बहती दिखाई देती हैं।

कहने को तो इस नदी के नाम पर अरबों रुपये की योजनाएं दौड़ रही हैं। मगर उसके मुखमंडल (उद्गम) को विद्रूप कर रहे सीवेज, शौचालय और पॉलीथीन पर किसी की नजर नहीं पड़ती। यह त्रासदी ही है कि नर्मदा जहां जन्म लेती है उसे वहीं हार झेलनी पड़ रही है। कपिलधारा जल प्रपात में नर्मदा की धार पर पॉलीथीन, प्लास्टिक बोतल, बिस्किट-नमकीन के रैपर दिल बैठने लगता है। पर्यावरणविद् इसका ठीकरा अमरकंटक में बेतहाशा आधुनिक निर्माण, कंक्रीट की दीवारों और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर फोड़ते हैं । सच बात तो यही है कि अमरकंटक की सीवर व्यवस्था चरमरा गई है। रामघाट स्थित सुलभ शौचालय के सामने बना सीवर चैंबर लगातार दूषित पानी उगलता रहा। यह गंदा पानी वैतरणी नदी के रास्ते आगे जाकर नर्मदा में मिल रहा है। कोटि तीर्थ घाट कुंड मार्ग पर भी सीवर चैंबरों के रिसाव के शिकायतें अधिकारियों तक पहुंची हैं। विडंबना है कि जिन घाटों पर हर साल लाखों श्रद्धालु स्नान और तर्पण करते हैं, उन्हीं की हवा दुर्गंध से भरी है।

नर्मदा को शिवपुत्री कहा जाता है। देश की सबसे पवित्र नदियों में इसका स्थान सबसे ऊंचा है जबलपुर के ग्वारी घाट पर किए गए वैज्ञानिक अध्ययन ने भयावह तथ्य उजागर किया। अध्ययन ने आगाह किया कि यहां नर्मदा जल में पीने, तैरने या घरेलू उपयोग के मानकों की अनुरूपता दूर-दूर तक नहीं है। यहां के नमूनों में फीकल कोलिफॉर्म बैक्टीरिया 200 से अधिक प्रति 100 मिलीलीटर, और साल्मोनेला, शिगेला सरीखे रोगजनक कीटाणु मिल चुके हैं। शोधकर्ताओं की चेतावनी है कि यहां रोज स्नान करने वालों को त्वचा और आंतों के रोगों का खतरा है।

इस साल अगस्त में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने खुलासा किया कि मध्य प्रदेश के 413 नगरीय निकायों में से 352 के पास सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) ही नहीं है। इसमें कहा गया कि 1,315 नालों से प्रतिदिन लगभग 637 मिलियन लीटर (एमएलडी) सीवेज बेतरतीब ढंग से तालाबों, नदियों और सहायक धाराओं में पहुंच रहा है। इन नदियों में नर्मदा, शिप्रा और चंबल भी हैं।
एनजीटी ने राज्य के शपथ पत्रों पर सवाल उठाया और कहा कि “जमीनी सत्यापन तक नहीं किया गया।” मुख्य सचिव को ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 की अनुपालन रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया।

इस साल फरवरी में मध्य प्रदेश के जबलपुर हाई कोर्ट ने एक पीआईएल पर नोटिस जारी किया। इस पीआईएल में आरोप लगाया गया था कि प्रतिदिन लगभग 98 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज नर्मदा में जा रहा है और पानी में फीकल कोलिफॉर्म (मानव-पशु मल से आने वाले बैक्टीरिया) की मात्रा ने नदी जल को पीने योग्य नहीं छोड़ा। हाई कोर्ट ने इसे अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) से जोड़कर देखा। यह तथ्य कितना खतरनाक है कि जबलपुर से प्रतिदिन निकलने वाले 174 मेगालीटर गंदे पानी में से सिर्फ 58 एमएलडी का उपचार 13 प्लांट में हो पाता है। बाकी 116 एमएलडी सीधे हिरन और नर्मदा में जाता है।

जबलपुर के खंडवारी नाले के पानी के अध्ययन में लेड, क्रोमियम, निकेल, जिंक, मैगनीज, तांबा, आयरन डब्ल्यूएचओ के पेयजल मानकों से कहीं अधिक मिले हैं। सभी नालों पर एसटीपी लगाने, उपचारित पानी का कृषि-औद्योगिक पुनः-उपयोग और रिटायर्ड न्यायमूर्ति की अध्यक्षता वाली मॉनिटरिंग कमेटी गठित करने के सुझाव अदालत में दिए गए। गौरीघाट पर तेल के दीपों के विसर्जन को भी प्रदूषण की एक बड़ी वजह बताया गया । मार्च 2026 में एक ऐसी खबर आई, जिसने नदीप्रेमियों को झकझोर दिया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने पहली बार 17 वर्ष में नर्मदा के मध्य प्रदेश वाले एक हिस्से को ‘प्रदूषित’ घोषित किया। यह हिस्सा खंडवा जिले के हनुवंतिया के पास का है। यहां बीओडी (बायो-केमिकल ऑक्सीजन डिमांड) का स्तर 7.4 मिलीग्राम प्रति लीटर बताया गया यानी मानक 3 एमजी/लीटर से कहीं ज्यादा।

विशेषज्ञ प्रो. विपिन व्यास का कहना है कि इंदिरा सागर डैम के कारण बहाव रुकने से नदी की ‘स्वयं-शुद्धि’ क्षमता धीमी हो जाती है और पर्यटन के बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप ने बीओडी को ऊपर धकेल दिया। ठीक इसके उलट एक उम्मीद भी है कि गुजरात सीमा का गरुड़ेश्वर-भरूच हिस्सा जो कभी भारी प्रदूषण का शिकार था, अब प्रदूषित नदी क्षेत्र की सूची से बाहर आ चुका है। यानी साफ होना असंभव नहीं — किन्तु प्रयास होने चाहिए। सीपीसीबी की रिपोर्ट में मध्य प्रदेश की 18 नदियों के कई हिस्से प्रदूषित हैं। इनमें चंबल, बेतवा, खांडवा, हिरन, क्षिप्रा, सोन (चितरंगी), मंदाकिनी (चित्रकूट), टोंस (सतना) भी हैं।

औद्योगिकीकरण, रेत खनन, वन कटाई कंक्रीट के जंगली विकास के लिए तो ठीक हो सकते हैं पर यह नदी की नसें काटते हैं। सीवेज के अलावा नर्मदा को कतरा-कतरा घाव देने के लिए जिम्मेदार और भी छाले हैं। यह छाले सदियों से बन रहे हैं। जबलपुर की लंघाई घाट की जिलेटिन फैक्टरी, नरसिंहपुर की छह चीनी मिलें, होशंगाबाद का सुहागपुर औद्योगिक क्षेत्र और केंद्र सरकार के सेक्योरिटी पेपर मिल ने अलग-अलग समय पर नदी में अपशिष्ट छोड़ने के आरोप सहे हैं।

अमरकंटक के गोमुख में 49 करोड़ रुपये के रामघाट पर कूड़ा और उसी के दो कदम नीचे सूखती धार, यही नर्मदा कथा का उपसंहार है। हम नदी के नाम पर मंदिर, घाट और प्रसाद योजनाओं के लिए अरबों का बजट देते हैं, लेकिन उसके पानी को शुद्ध बहाव के लायक नहीं छोड़ते। जिसे हम शिव पुत्री कहते हैं, उसके आंगन में मल के 1315 नाले — यह क्या, धर्म का सबसे बड़ा मजाक है? यह बिलकुल सोलह आना सच है कि पत्थर बिछाकर और पत्थर तराशकर नहीं, जल बचाकर ही शिव की पूजा होगी। इसलिए नर्मदा को निर्मल रखना हम सबकी जिम्मेदारी है।

अब इसकी अभिशप्त प्रेमकथा पर लौटते हैं। पहली कथा तो यह है कि नर्मदा और शोणभद्र की शादी होने वाली थी। विवाह मंडप में बैठने से ठीक ऐन वक्त पर नर्मदा को पता चला कि शोणभद्र की दिलचस्पी उसकी दासी जुहिला (यह आदिवासी नदी मंडला के पास बहती है) में अधिक है। प्रतिष्ठित कुल की नर्मदा यह अपमान सहन न कर सकी और मंडप छोड़कर उल्टी दिशा में चली गई। शोणभद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह भी नर्मदा के पीछे भागा। वह गुहार लगाता रहा लौट आओ नर्मदा’…। लेकिन नर्मदा को नहीं लौटना था सो वह नहीं लौटी।

अब आप कथा का भौगोलिक सत्य देखिए कि सचमुच नर्मदा भारतीय प्रायद्वीप की दो प्रमुख नदियों गंगा और गोदावरी से विपरीत दिशा में बहती है। यानी पूर्व से पश्चिम की ओर। कहते हैं आज भी नर्मदा एक बिंदु विशेष से शोणभद्र से अलग होती दिखाई पड़ती है। कथा की फलश्रुति यह भी है कि नर्मदा को इसीलिए चिरकुंवारी नदी कहा गया है और ग्रहों के किसी विशेष मेल पर स्वयं गंगा नदी भी यहां स्नान करने आती हैं। इस नदी को गंगा से भी पवित्र माना गया है।

मत्स्यपुराण में नर्मदा की महिमा इस तरह है, ‘कनखल क्षेत्र में गंगा पवित्र है और कुरुक्षेत्र में सरस्वती। परन्तु गांव हो चाहे वन, नर्मदा सर्वत्र पवित्र है। यमुना का जल एक सप्ताह में, सरस्वती का तीन दिन में, गंगाजल उसी दिन और नर्मदा का जल उसी क्षण पवित्र कर देता है।’ एक अन्य प्राचीन ग्रन्थ में सप्त सरिताओं का गुणगान इस तरह है। गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदा सिन्धु कावेरी जलेSस्मिन सन्निधिं कुरु।।

एक और कथा है। इसमें नर्मदा को रेवा नदी और शोणभद्र को सोनभद्र के नाम से जाना गया है। नद यानी नदी का पुरुष रूप। (ब्रह्मपुत्र को भी नदी नहीं ‘नद’ ही कहा जाता है।) बहरहाल यह कथा बताती है कि राजकुमारी नर्मदा राजा मेखल की पुत्री हैं। राजा मेखल ने अपनी अत्यंत रूपसी पुत्री के लिए यह तय किया कि जो राजकुमार गुलबकावली के दुर्लभ पुष्प उनकी पुत्री के लिए लाएगा वे अपनी पुत्री का विवाह उसी के साथ करेंगे। राजकुमार सोनभद्र गुलबकावली के फूल ले आए। अत: उनसे राजकुमारी नर्मदा का विवाह तय हुआ।

नर्मदा ने अब तक सोनभद्र को नहीं देखा था पर उसके रूप, यौवन और पराक्रम की कथाएं सुनकर मन ही मन वह भी उसे चाहने लगीं। विवाह होने में कुछ दिन शेष थे। नर्मदा से रहा न गया उसने अपनी दासी जुहिला के हाथों प्रेम संदेश भेजने को सोचा। इस पर जुहिला को ठिठोली सूझी। उसने राजकुमारी से उसके वस्त्राभूषण मांगे और चल पड़ी राजकुमार से मिलने। सोनभद्र के पास पहुंची तो राजकुमार सोनभद्र उसे ही नर्मदा समझने की भूल कर बैठा। जुहिला की ‍नियत में भी खोट आ गया। राजकुमार के प्रणय निवेदन को वह ठुकरा न सकी। इधर नर्मदा का सब्र का बांध टूटने लगा। दासी जुहिला के आने में देरी हुई तो वह स्वयं चल पड़ी सोनभद्र से मिलने।

वहां पहुंचने पर सोनभद्र और जुहिला को साथ देखकर वह अपमान की भीषण आग में जल उठी। तुरंत वहां से उल्टी दिशा में चल पड़ी फिर कभी न लौटने के लिए। सोनभद्र अपनी गलती पर पछताता रहा लेकिन स्वाभिमान और विद्रोह की प्रतीक बनी नर्मदा पलट कर नहीं आई।

अब इस कथा का भौगोलिक सत्य देखिए कि जैसिंहनगर के ग्राम बरहा के निकट जुहिला (इस नदी को दूषित नदी माना जाता है, पवित्र नदियों में इसे शामिल नहीं किया जाता) का सोनभद्र नद से वाम-पार्श्व में दशरथ घाट पर संगम होता है और कथा में रूठी राजकुमारी नर्मदा कुंवारी और अकेली उल्टी दिशा में बहती दिखाई देती है। रानी और दासी के राजवस्त्र बदलने की कथा इलाहाबाद के पूर्वी भाग में आज भी प्रचलित है।

एक और कथा में कहा जाता है कि यह हजारों वर्ष पहले की बात है। नर्मदा नदी बनकर जन्मी। सोनभद्र नद बनकर जन्मा। दोनों के घर पास थे। दोनों अमरकंटक की पहाड़ियों में घुटनों के बल चलते। चिढ़ते-चिढ़ाते। हंसते-रूठते। दोनों का बचपन खत्म हुआ। दोनों किशोर हुए। लगाव और बढ़ने लगा। गुफाओं, पहाड़‍ियों में ऋषि-मुनि व संतों नें डेरे डाले। चारों ओर यज्ञ-पूजन होने लगा। पूरे पर्वत में हवन की पवित्र समिधाओं से वातावरण सुगंधित होने लगा। इसी पावन माहौल में दोनों जवान हुए। दोनों ने कसमें खाईं। जीवन भर एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ने की। एक-दूसरे को धोखा नहीं देने की।
एक दिन अचानक रास्ते में सोनभद्र के सामने नर्मदा की सखी जुहिला नदी आ धमकी सोलह शृंगार किए हुए। उसने अपनी अदा से सोनभद्र को मोह लिया। सोनभद्र अपनी बाल सखी नर्मदा को भूल गया। जुहिला को अपनी सखी के प्यार पर डोरे डालते लाज न आई। नर्मदा ने सोनभद्र को समझाने की बहुत कोशिश की। लेकिन सोनभद्र तो जैसे जुहिला के लिए बावरा हो गया था।
नर्मदा ने किसी ऐसे ही असहनीय क्षण में निर्णय लिया कि ऐसे धोखेबाज के साथ से अच्छा है इसे छोड़कर चल देना। कहते हैं तभी से नर्मदा ने अपनी दिशा बदल ली। सोनभद्र और जुहिला ने नर्मदा को जाते देखा। सोनभद्र को दुख हुआ। बचपन की सखी उसे छोड़कर जा रही थी। उसने पुकारा- ‘न…र…म…दा… रुक जाओ, लौट आओ नर्मदा।

लेकिन नर्मदा ने कुंवारी रहने का प्रण कर लिया। युवावस्था में ही संन्यासी बन गई। रास्ते में घनघोर पहाड़ियां आईं। हरे-भरे जंगल आए। पर वह रास्ता बनाती चली गईं। कल-कल, छल-छल का शोर करती बढ़ती गईं। मंडला के आदिमजनों के इलाके में पहुंची। कहते हैं आज भी नर्मदा की परिक्रमा में कहीं-कहीं उसका करुण विलाप सुनाई पड़ता है। नर्मदा नें बंगाल सागर की यात्रा छोड़ी और अरब सागर की ओर दौड़ी। भौगोलिक तथ्य देखिए कि हमारे देश की सभी बड़ी नदियां बंगाल सागर में मिलती हैं लेकिन गुस्से के कारण नर्मदा अरब सागर में समा गई।

नर्मदा की कथा जनमानस में कई रूपों में प्रचलित है लेकिन चिरकुवांरी नर्मदा का सात्विक सौन्दर्य, चारित्रिक तेज और भावनात्मक उफान नर्मदा परिक्रमा के दौरान हर संवेदनशील मन महसूस करता है। कहने को वह नदी रूप में हैं लेकिन चाहे-अनचाहे भक्त-गण उनका मानवीयकरण कर ही लेते हैं। पौराणिक कथा और यथार्थ के भौगोलिक सत्य का सुंदर सम्मिलन उनकी इस भावना को बल प्रदान करता है और वे कह उठते हैं नमामि देवी नर्मदे। आज फिर नर्मदा रो रही है। उसकी चीखें भेड़ाघाट में संगमरमर की चट्टानों से टकरा रही हैं।

waterwatchworld.com डिस्क्लेमरः नर्मदा के प्रदूषण पर यह रिपोर्ट तैयार करने में ”दैनिक भास्कर, शिखरवाणी, ईटीवी भारत, स्टार समाचार, टाइम्स ऑफ इंडिया के समाचारों का सहारा लिया गया है।

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