बांदा में केन नदी पर खनन । फोटो-ग्रैब दैनिक भास्कर

बुंदेलखंड में रेत खननः पहाड़ खा गए वो ‘पेट’ और जो नदी खा गई वो ‘मां’

मुकुंद/अभिमन्यु, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र से

कभी यहां श्मशान था…। अब उसमें मुर्दे नहीं जलते। रेत की बोरियां रखी होती हैं। जिस जमीन पर मनुष्य की आखिरी यात्रा रुकती है, जेसीबी ने उसी की कब्र खोद डाली। बुंदेलखंड के बांदा में यह कोई इकलौता वाकया नहीं — यह उस केन नदी की रोज की कहानी है, जिसके पेट से रोटी निकलती है और जिसका पेट धंसता जा रहा है।

अब केन नदी में पानी के बीचों-बीच पोकलेन खड़ी होती हैं। माफिया ने नदी के भीतर सड़कें और अस्थाई बंधे बना दिए — ताकि ट्रक सीधे पानी में उतरकर रेत चुरा सकें। कछुए और मछलियां जिस रेतीले तल पर बच्चे देती थीं, वह तल ही उड़ता जा रहा है। पुल से महज़ 160 मीटर दूर खुदाई — जबकि नियम 200 मीटर का है। और जब सरकार से पूछा गया कि 719 शिकायतों के बाद नदी की सेहत बिगड़ी क्या, तो जवाब आया- “कोई जानकारी नहीं।”

पन्ना के भारत मिलन पांडे ने शिकायत की तो उन पर और उनके परिवार पर झूठे केस दर्ज हो गए। हाईकोर्ट ने जमानत दी। बांदा में एक एसडीएम ने रेत के दो ट्रक पकड़े तो विधायक समर्थकों ने ड्राइवर को पीट-पीटकर छोड़ दिया। वहीं 85 साल की बूढ़ीबाई पर 22 करोड़ का जुर्माना — ऐसी दुनिया में शायद नदी के लिए खड़े होने की हिम्मत ही सबसे बड़ा अपराध है।

कबरई की धूल में जिंदा अर्थी
महोबा-कबरई की हवा में सिलिका। 600 क्रशरों की धूल उन मजदूरों के फेफड़ों में जम रही है जिनकी 70 फीसद संख्या बीमार पड़ती है। किसान राजकुमार कहते हैं — पहले दो बीघा में साल भर का अनाज होता था। अब 10 बीघा भर भी नहीं होता। और फिर भी यही खदान उनकी रोटी है — बंद होने पर पलायन, चलने पर बीमारी। मौत के दोनों सिरे एक ही पहाड़ पर।

क्या है असली जवाब?
न तो खनन बंद करने का रोना, न अंधा विरोध। जरूरत है उस खनन की जो सीजन में, सीमा में, सद्बुद्धि में हो — जहां नदी की रेत तय मात्रा में, तय गहराई पर, मशीनों की जगह आदमी से निकले। चार जिलों का एक संयुक्त पहरा, सीमाओं का अंत, शिकायतकर्ता की ढाल, घड़ियाल-तटों पर शून्य खनन — और खनन का वह राजस्व जो वहीं लौटे, जहां से रेत निकलती है।

तब तक…जिस रेत से घर बनते हैं, वही रेत जब नदी की कोख से निकलती है, तो घरों से पहले मां मरती है। बुंदेलखंड के बच्चे आज रेत की मुट्ठी में सपने भरते हैं — चाहे मुट्ठी खाली ही रह जाए। क्योंकि नदी उस दिन सचमुच बचती है, जब उसकी रेत किसी की इज्जत से सस्ती नहीं पड़ती।

आइए, इस दर्द को विस्तार से समझते हैं…
रेत ओर पत्थर — दो ऐसे नाम, जो बुंदेलखंड की जमीन पर एक साथ रोटी भी बनाते हैं और मकबरे भी। मशीनें नदी की कोख में उतरती हैं और पहाड़ की छाती पर चढ़ती हैं। जो लोग इन्हें देखते हैं, वे ‘रोजगार’ कहते हैं; जो इनके भीतर दबे हैं, वे ‘मौत’ कहते हैं। सच किसका है?

बुंदेलखंड के बांदा जिले में यमुना के किनारे एक श्मशान घाट है। जनवरी 2026 में वहा कुछ ऐसा हुआ, जिसने पूरे इलाके को झकझोर दिया — जिस जमीन पर मुर्दे जलाए जाते हैं, उसी पर जेसीबी मशीनों से रेत की खुदाई होने लगी। मृतकों की अस्थियों के बीच रेत के ट्रक खड़े हो गए। ग्रामीणों ने बताया कि एक नामचीन ‘अंसार’ ने श्मशान की जमीन पर कब्जा कर जमीन के पेट में हाथ डाल दिया है। आस्था का वह स्थान खनन-युद्ध का अखाड़ा बन गया।

पर शायद यही वह दृश्य है जो पूरी कहानी पढ़ता है — जब नदी के किनारे की पवित्रता ही उसके किनारे धंसती है, तो जीवन की दीवारें कहां टिकेंगी? यह रिपोर्ट उन्हीं मशीनों, उसी रेत, उन्हीं पहाड़ों और उन लोगों के बारे में है, जिनके नाम पर यह सब हो रहा है — और जिनके नाम पर यह सब हो रहा है, वे अकसर बचते नहीं।

खनन यहां वह सिक्का है, जिसके चमकने से आंखें भूल जाती हैं बोलना। खनन बुंदेलखंड में रातों-रात माफिया के हाथ में नहीं आया। वह वहां का एकमात्र ‘उद्योग’ रहा है। उसी के बूते बहुत-से परिवार चलते रहे हैं। यहां रोजगार का आखिरी दरवाजा भी अब यहीं खुलता है। यह वह इलाका है जहां मनरेगा की दिहाड़ी पेट नहीं भरती, जहां कानूनी काम नहीं, कानून के बगैर काम मिलता है। कबरई जैसी जगह पर खदान का एक दिन का काम मनरेगा से करीब दुगुना भुगतान देता है। इसीलिए जब खदानें बंद होती हैं, तो गांव भूतिया हो जाते हैं। भरतकूप का उदाहरण सामने है, जहां क्रशर्स के बंद होते ही मजदूर पलायन कर गए और घर बची स्त्रियां, बच्चे, बूढ़े — भूख से लड़ते रहे। यानी यह रोजगार रोटी का स्रोत है, चाहे वह रोटी कितनी ही दानेदार क्यों न हो।

खनन को सरकारी खजाने की धमनियां कहा जा सकता है। उत्तर प्रदेश सरकार के आधिकारिक दावे के मुताबिक, पारदर्शी ई-नीलामी और डिजिटल व्यवस्था के बाद 2017 से 2026 के बीच खनन से ₹30,524 करोड़ से अधिक का राजस्व मिला। जबकि 2012-17 में यह महज ₹4,700 करोड़ था। बांदा जिले की पंचायत ने 2025-26 में खनिज परिवहन शुल्क से ₹16.22 करोड़ कमाए और प्रदेश में पहला स्थान पाया। अगले साल के लिए यह ठेका ₹19.05 करोड़ में हुआ — पिछले साल से 230 फीसद अधिक। इसी वजह से प्रशासन हर रोज ‘राजस्व निकालने’ की बात करता है, और जब राजस्व की भाषा बोलते हैं, तो नदी की भाषा भूल जाते हैं।

यह सच है कि खनन — निर्माण की नींव रखता। रेत और पत्थर के बिना कोई घर, कोई सड़क, कोई पुल नहीं बनता। यह इलाका पूरे उत्तर भारत की निर्माण आपूर्ति का स्रोत है। इसी लिहाज से इसे ‘विकास की धमनी’ कहा जाता है। तो असली सवाल यह है — विकास के नाम पर कितना विकास, और किस कीमत पर? लाभ की ऊपर की सतह इसीलिए लिखी गई है, ताकि नुकसान की गहराई समझी जा सके। क्योंकि यह सब ‘लाभ’ उस शर्त पर खड़ा है, जो धीरे-धीरे टूट रही है — जिस नदी से रेत निकलती है, वही नदी सूखती जा रही है; जिस पहाड़ से पत्थर गिरता है, वही पहाड़ गिर जाता है।

केन और यमुना की कराह
बांदा के लोग केन को ‘जीवनरेखा’ कहते हैं। कवि केदारनाथ अग्रवाल की इन्हीं नदियों में से एक केन है। पर इसी केन में पोकलेन मशीनें नदी के बीचोंबीच पानी में उतर जाती हैं, रेत निकालने के लिए सक्शन पंप वाली नावें (बार्ज) चलती हैं। पन्ना के अजयगढ़ से बांदा के चिल्ला घाट तक केन की लगभग 106 किलोमीटर की निचली धारा अपनी मूल संरचना खो चुकी है।

मध्य प्रदेश के नियम (बालू नियम 2019) और एनजीटी के दिशा-निर्देश कहते हैं कि पुल के 200 मीटर के भीतर खनन नहीं होना चाहिए। पर अप्रैल 2024 के सैटेलाइट चित्रों में पन्ना-छतरपुर के बीरा पुल पर 160 मीटर की दूरी पर भी खनन दिखा। सतह से 3 मीटर से अधिक गहराई काट दी गई। नदी के बीच ट्रकों के लिए अस्थाई बांध और पुल बना दिए गए हैं, जो पानी का बहाव रोकते हैं।

केन वह नदी है, जो अभी तक औद्योगिक प्रदूषण से लगभग मुक्त है — यानी हमारी कुछ साफ नदियों में से एक। यही उसकी दुर्दशा को और बढ़ा देता है — क्योंकि खनन का कहर उस पर उसी अनुपात से गिरता है जिस अनुपात से वह साफ थी। 2017 के एक अध्ययन में दर्ज किया गया कि केन लगातार दो साल पूरी तरह सूख चुकी थी — नहीं, ‘घट गई’ नहीं, सूख चुकी थी। मछुवारों और किसानों की भाषा में नदी का ‘मरना’ आज कोई अलंकार नहीं, आंकड़ा है।

बांदा में यमुना से घाटों से लेकर श्मशानों तक रेत निकाली जाती है। ‘दांदो खादर’ जैसे घाटों पर थाने से कुछेक ही मीटर दूर माफिया खुलेआम धारा मोड़कर मशीनें चलाते हैं। किसानों के खेत रेत के ट्रकों के रास्ते बन जाते हैं — 2018 में महोबा के श्रीनगर इलाके में किसानों ने विरोध किया तो जवाब में उनके खेतों से राह बनाने के लिए करीब 50 पेड़ काट दिए गए।

पन्ना निवासी भारत मिलन पांडेय ने केन में बिना कानूनी पट्टे के मशीनें चलते देखकर शिकायत की। जवाब में उन्हीं पर और उनके परिवार पर झूठे केस दर्ज कर दिए गए। उन्हें मध्य प्रदेश हाई कोर्ट से जमानत मिली और अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।

महोबा, कबरई और भरतकूप— यहां ‘पहाड़ खनन’ वह कड़ी है, जो सबसे ज्यादा चुपचाप मारती है। महोबा का कबरई, चित्रकूट का भरतकूप, बांदा का मटौंध — इन इलाकों में करीब 600 स्टोन क्रशर काम करते हैं। इनमें वे भी शामिल हैं, जो बिना पॉल्यूशन एनओसी और बिना कंसेंट चल रहे हैं — एनजीटी ने 2019, 2021 और 2022 में बार-बार महोबा के खनन और क्रशरों के खिलाफ आदेश दिए। इसके बाद दिन में सन्नाटा और रात में ब्लास्टिंग, हवा-शोर प्रदूषण, खेतों पर धूल का ढेर लगने लगा।

जो धूल पहाड़ों में रहती है, वही हमारे फेफड़ों में आकर जमती है — चित्रकूट-बांदा और महोबा के क्रशर क्षेत्रों में हवा में आरएसपीएम (पीएम10) 162 से 253 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक मिला — सुरक्षित मानक से कई गुना ऊपर। सांस में घुलने वाले सिलिका कण यहां के मज़दूरों के लिए मौत का इंतजार करते हैं। कबरई के कालूराम कुशवाहा कहते हैं, “क्रशर में काम करने वालों में से 70 फीसद लोग बीमार पड़ जाते हैं।”
भरतकूप के किसान राजकुमार कहते हैं, “पहले दो-तीन बीघा में पूरे साल भर का अनाज हो जाता था। अब मिट्टी बंजर है, दस बीघा में भी नहीं होता।” आसपास के गांवों में तपेदिक, दमा और कैंसर के मामलों को गिनने वाली कोई सूची नहीं, पर हर घर की अपनी तकलीफ है।

घड़ियाल, बाघ और नदी का अदृश्य जाल खनन का असर सिर्फ इनसान तक सीमित नहीं है। केन नदी में घड़ियाल अभयारण्य (1981 से) है, जहां दुनिया के सबसे पुराने सरी सृपों में से घड़ियाल बसते हैं। यह वही नदी है जो पन्ना टाइगर रिजर्व के बाघों को पानी देती है — वह जगह जहाँ 2009 तक बाघ खत्म हो चुके थे और जहां बाद में संरक्षण से बाघों की वापसी हुई। खनन मशीनें जब नदी के बीच रेत चूसती हैं तो वे अंधेरे में बाघ के जलमार्ग, घड़ियाल के अंडे-जगह और मछलियों की पैमाइश को भी निगल जाती हैं। सुप्रीम कोर्ट अब इसी चिंता को राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य के मामले के साथ सुन रहा है।

जब कानून, मशीन और माफिया का युग-संधि होती है ऊपर लाभ और नुकसान की सूची पढ़कर कोई कह सकता है — यह तो हर उद्योग की कहानी है। पर बुंदेलखंड में एक अतिरिक्त परत है, जो सब कुछ तय करती है। वह है इसका विशाल भू-स्वामित्व, सत्ता और कानून के बीच का फासला।
जिलों की सरहद खनन की ढाल बन गई है। पन्ना-छतरपुर-बांदा की त्रिसीमा पर जब एक जिले की टीम आती है, मशीनें सरहद पार दूसरे जिले में सरक जाती हैं। छतरपुर की कार्रवाई में पन्ना की तरफ आ गए। पन्ना की टीम पहुंची तो बांदा की ओर चले गए। कोई जिला अपनी सरहद से बाहर कार्रवाई नहीं कर पाता। यानी माफिया ने भूगोल से बड़ा कानून खोज लिया है।

राजस्व बढ़ता गया, नदी कटती गई। बांदा में दिसंबर 2025 में 92 वाहन पकड़े गए और ₹1.28 करोड़ वसूला गया। मई 2026 में 10 लीज की जांच में करीब ₹8 करोड़ का जुर्माना और 132 वाहनों पर कार्रवाई हुई। प्रशासन को गर्व है। पर हर जुर्माने का पैसा नदी से निकली रेत की बिक्री से आया — मतलब कानून, अपराध और राजस्व एक ही चक्र में घूम रहे हैं। इसमें नदी कहां है? जवाब है… कहीं नहीं।

‘जो सबसे ज्यादा जोर से बोले, वही मालिक’। जून 2025 में बांदा में एक एसडीएम ने अवैध रेत के दो ट्रक जब्त किए — और एक विधायक के समर्थकों ने उन्हीं की सरकारी गाड़ी घेर ली। ड्राइवर को नीचे खींचकर पीटा और मशीन से रेत छोड़ने का दबाव डाला। एफआईआर दर्ज हुई, पर किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई। जो अफसर रोज नदी के लिए लड़ता है, वही उस दिन अपनी जान के लिए लड़ता है।

गांव बदल गए, हिसाब नहीं। जहां खदानें चलती हैं, वहां सड़कें ट्रकों ने चाट लीं। खेतों की मिट्टी धूल में उड़ गई। पानी का स्तर डूब गया। पर खदान के पट्टे वहां आवंटित होते हैं जहां सबसे ज्यादा मशीनरी और दबाव है — अकसर यह आवंटन दिल्ली-कानपुर-लखनऊ के ठेकेदारों को होता है। इसीलिए पहाड़ और नदी का जो कर्ज बुंदेलखंड के लोगों ने चुकाया है, वह मशीनों ने अपनी तरफ से हमेशा सिर्फ उधार ही छोड़ा है।

सबसे गहरा परिणाम — पानी का सूखना। केन का पूरा सूख जाना। यमुना की घटती धारा। गर्मी में बोरिंग का सूखना — ये ‘पर्यावरणीय नुकसान’ नहीं, बुंदेलखंड के जीवन-स्रोत का हश्र है। जब नदी सूखती है, तो सिर्फ रेत नहीं जाती। सिंचाई जाती है। पीने का पानी जाता है। मछुआरे कर्ज में डूबते हैं। किसान दांव पर लगते हैं।

समाधान की राहें
इस रिपोर्ट को ‘खनन बंद करो’ का नारा नहीं समझा जाए — क्योंकि बिना रोजगार के गांव मरेंगे और बिना विकल्प के रोटी का सवाल पानी के सवाल को रौंद देगा। असली उपाय वही है जहां रोजगार और संरक्षण दोनों साथ चलें।

सिक्के के दूसरे पहलू को भी देखने की जरूरत है। जो खनन पट्टे जारी होते हैं, उनमें जीपीएस-सीमांकन, गहराई की सीमा (3 मीटर), पुल-घाट की दूरी (200 मीटर) और मौसमी रोक के नियमों का सख्ती से पालन हो। मशीनों से निकली सूखी रेत के बजाय नदी की मौजूदा अधिशेष रेत (जो बाढ़-पानी में निकलती है) को सीजनल चक्र में ही खनन की अनुमति दी जाए — जैसा कई नदियों के लिए वैज्ञानिक सुझाव है।

पन्ना-छतरपुर-बांदा की त्रिसीमा के लिए चार जिलों की संयुक्त टास्क फोर्स यानी एक ही कमांड हो — ताकि सरहद पार भागना बेअसर हो। सुप्रीम कोर्ट ने चंबल घड़ियाल मामले में जैसा कहा — वन अधिकारियों को सुरक्षा और अधिकार — वैसा ही सुरक्षा-जाल हर जिले के खनन-अधिकारियों और वनकर्मियों के लिए हो।

इस में डिजिटल निगरानी को अंतिम मंजिल समझा जाए। वीटीएस (वाहन ट्रैकिंग), ई-रवन्ना, सैटेलाइट के साप्ताहिक चित्र, ड्रोन की गश्त — ये उपकरण राजस्व तो बढ़ा चुके हैं, अब इन्हीं से नदी के मौसमी चक्र और खनन की मात्रा को नियंत्रित किया जाए। जहां रेत है वहीं खनन हो। जहां घड़ियाल-घोंसला हो वहां ऐसा न हो और इसका डेटा भी सार्वजनिक हो।

श्मशान-घाट जैसे पवित्र स्थलों पर बिना शर्त खनन कार्य में रोक हो। जो जगह धर्म, सभ्यता और आस्था की है, वहां होने वाला खनन न केवल कानूनी बल्कि सामाजिक अपराध है। ऐसी हर जगह की एक सूची बने और उसमें एक भी छेद न रहे।

स्टोन क्रशर्स में काम करने वालों की फेफड़ों की जांच (सिलिकोसिस स्क्रीनिंग), स्वास्थ्य बीमा और मुआवज़ा तंत्र अनिवार्य हो। खदान-नियोक्ताओं को भी उतनी ही जिम्मेदारी देना, जितनी मशीन खुद नहीं उठाती — यानी श्रम की कीमत को पर्यावरण के साथ बराबर तौलना। खनन का जो राजस्व मिल रहा है (बांदा में 16 करोड़, प्रदेश में 30 हजार करोड़), उसका एक निश्चित हिस्सा सीधे उन्हीं गांवों के पीने के पानी, स्कूल, अस्पताल और नदी-पुनर्जीवन पर खर्च हो — जहां से रेत और पत्थर निकलते हैं।

बुंदेलखंड के इस खनन संघर्ष में सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि रेत हमारे हाथ से फिसलती है, पर उसकी तस्वीर नदी के तल में गढ़ जाती है। लोग कहते हैं कि पैसे की कमी की वजह से खनन होता है, पर जमीन की कमी की वजह से उसके बाद न पढ़ाई होती है, न इलाज, न भविष्य।

हर साल बरसात में बुंदेलखंड के किसान खेत की मेड़ पर खड़े होकर केन की ओर देखते हैं — जैसे किसी मां की गोद की ओर देखते हैं। वे नहीं जानते कि जिस रेत से वे अपनी मेड़ें बनाते हैं, वही रेत इस साल सड़कों पर बिक चुकी होगी। … और अगली बार पानी ही नहीं बचेगा।

और अगर बुंदेलखंड की नदियां बचानी हैं, तो मशीनों को रोकना नहीं, सद्बुद्धि देनी होगी। जो रोकने से पहले पूछे, यह रेत किसे चाहिए, कितनी चाहिए, कब चाहिए और इसके बदले हम क्या दे रहे हैं? जब यह सवाल पूछा जाएगा और इसका जवाब नदी के किनारे बैठा हर बच्चा जानेगा — तब समझिए, खनन नीति बन चुकी है। और तब तक, बुंदेलखंड का हर बच्चा सोते-जागते रेत की मुट्ठी फिर से भरने का सपना देखेगा— चाहे वह मुट्ठी खाली ही क्यों न हो।

नोट- इस रिपोर्ट के संदर्भ स्रोत
पीएचएम न्यूज (05जनवरी, 2026) — बांदा: श्मशान घाट की जमीन पर जेसीबी से रेत खनन

सिटी न्यूज यूपी (01 मई, 2025) — बांदा ‘दांदो खादर’ अवैध खनन, प्रशासनिक मिलीभगत के आरोप

तरुण मित्र (17 अप्रैल, 2026) — बांदा-हमीरपुर केन मोरंग खनन, किसान फकीरे सिंह की शिकायत

भास्कर (19जून, 2025) — भुरेड़ी खदान: पट्टा समाप्ति के बाद खनन, 20 ट्रक-3 पोकलेन सीज, ₹2 करोड़ तक जुर्माने की चेतावनी

बुंदेलखंड न्यूज (11 मार्च, 2025) — फरवरी-मार्च छापे: 1.25 करोड़+ जुर्माना, 200 वाहन पकड़े गए

आजतक / लोकराग (दिसंबर 2025) — बांदा: 92 वाहन, ₹1.28 करोड़ वसूली; दिसंबर 2025

अमर उजाला (27मई, 2026/ 03.मई 2026) — मई 2026: 10 लीज, ₹8 करोड़ जुर्माना, 132 वाहन; पंचायत खनिज ठेका ₹19.05 करोड़ (230% अधिक)

जनसत्ता (25 जून, 2025) — बांदा: विधायक समर्थकों द्वारा एसडीएम की गाड़ी घेरना, ड्राइवर पर हमला

डाउन टू अर्थ (08 अगस्त, 2022) — महोबा स्टोन खनन पर एनजीटी आदेश; कमलापत मामला

खबर लहरिया (17 दिसंबर, 2019/ 12 नवंबर, 2024) — बुंदेलखंड में 600 क्रशर; कालूराम कुशवाहा, राजकुमार के बयान; नदियों पर मशीनी खनन

स्कॉल.इन (खबर लहरिया) — भरतकूप: बंद क्रशर, पलायन, बीमारियां

द वायर हिंदी (सतीश मालवीय, 15. जुलाई, 2023) — केन की 106 किमी निचली धारा का विनाश; विशाल कांबोज का विश्लेषण

एसएएनडीआरपी (अप्रैल 2024) — केन पर बीरा पुल (160 मी), 3 मीटर गहराई, सक्शन पंप बार्ज; म.प्र. बालू नियम 2019

हिंदुस्तान टाइम्स / प्राइम टीवी इंडिया / इंडियन विटनेस (27 अगस्त 2026) — केन रेत खनन मामला सुप्रीम कोर्ट में; भारत मिलन पांडे याचिका; चंबल घड़ियाल संज्ञान

पत्रिका (06 मार्च, 2026) — छतरपुर-पन्ना सीमा: नदी के बीच पोकलेन; राज्य विधानसभा में 719 शिकायतों का खुलासा
वाइल्डलाइफ एसओएस / काउंटरव्यू (2024-2026) — केन घड़ियाल अभयारण्य, पन्ना बाघ बहाली, 2017 केन सूखने का अध्ययन

द वायर (2018) — महोबा श्रीनगर: किसानों के खेतों से ट्रक मार्ग, 50 पेड़ काटे गए
एशिया टाइम्स (2018)/ आईजेएसआर (पीके जैन) — ग्रेनाइट खनन से जल-स्तर, धूल, भू-क्षरण, स्वास्थ्य प्रभाव

फोर्थ पिलर (23 जुलाई, 2026) — यूपी खनन राजस्व ₹30,524 करोड़ (2017-26) बनाम ₹4,700 करोड़ (2012-17), सरकारी दावा; ‘Mine Mitra’ पोर्टल
बांदा जिला प्रशासन (banda.nic.in) — ई-नीलामी अधिसूचनाएं; हिन्दुस्तान (03दिसंबर, 2025) — वीटीएस अनिवार्यता

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