मुकुंद/अभिमन्यु, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र
बुंदेलखंड की प्यास को महसूस करने के लिए केन-बेतवा लिंक परियोजना का पूरा समीकरण समझना होगा। देश में नदी जोड़ो की पहली परियोजना पर करोड़ों का भरोसा और बराना किनारे चिताओं का सवाल मुंह बाए खड़ा। इस परियोजना को देश का सबसे बड़ा पानी का सपना माना गया। लेकिन जब वही नदी किसी की मां, खेत और गांव को निगलने लगे, तो सपने का दूसरा पहलू खड़ा हो जाता है। यह रिपोर्ट उसी दूसरे पहलू की पड़ताल है — बगैर किसी लाग लपेट के।
20 सितंबर 2026 — यह तारीख बुंदेलखंड के दिल में दर्ज हो चुकी है। रात के अंधेरे में ही मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले की बराना नदी के बीचों-बीच पिछले 16 दिनों से चल रहे ‘चिता आंदोलन’ को पुलिस और प्रशासन ने संयुक्त कार्रवाई कर समाप्त कर दिया। सैकड़ों पुलिसकर्मियों ने नदी क्षेत्र की घेराबंदी की। आंदोलनकारियों को उठाया । आंदोलन के संयोजक अमित भटनागर समेत कई नेताओं को हिरासत में ले लिया।
प्रशासन का तर्क है कि बारिश से बराना का जलस्तर लगातार बढ़ रहा था। नदी के बीच बैठे लोगों की जान खतरे में थी। इसलिए सुरक्षा के मद्देनजर हटाया गया। आंदोलनकारियों का आरोप है कि जिन महिलाओं ने बच्चों संग नदी पार की, उन पर भी लाठी चली। भटनागर ने अस्पताल में भी अनशन जारी रखा। कहा — “न ड्रिप लगवाऊंगा और न कुछ खाऊंगा।”
इस एक घटना में देश की पहली नदी-जोड़ो परियोजना के सारे विवाद समा गए। विकास के लाभ, विस्थापन का दर्द, जंगल की कीमत और कानून का तराजू। आइए सबको गिना जाए।
केन-बेतवा लिंक परियोजना (केबीएलपी) भारत की पहली अंतर-बेसिन नदी-जोड़ो परियोजना है। यह 1980 के राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना में तय 30 नदी-जोड़ो परियोजनाओं में पहली है। इसके अंतर्गत केन नदी पर डौंढान (दौधन) बांध की परिकल्पना है। यह लगभग 77 मीटर ऊंचा और 2 किलोमीटर से अधिक लंबा होगा। इसके जलाशय की क्षमता 2,853 मिलियन घन मीटर बताई गई।
लिंक- 221 किलोमीटर लंबा कैनाल (नहर), जिसमें 2 किलोमीटर की सुरंग भी शामिल है। यह सुरंग केन का पानी बेतवा में पहुंचाएगी।
इसकी लागत 44,605 करोड़ है। केंद्र का हिस्सा 39,317 करोड़ रुपये है (ग्रांट 36,290 करोड़ + लोन 3,027 करोड़ रुपये)। यानी 90 फीसदी। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का हिस्सा 10 फीसद।
मील के पत्थर: मार्च 2021 में मध्य प्रदेश-उत्तर प्रदेश-केंद्र के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ। दिसंबर 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद दिसंबर 2024 में खजुराहो में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नींव रखी। जून 2026 तक इस पर 12,381 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। इसके पूरा होने की समय सीमा मार्च 2030 है।
यह सूखे बुंदेलखंड के लिए वरदान की कहानी भी है। इस परियोजना के पीछे जो तर्क है, वह भावनात्मक नहीं, आंकड़ों से उपजा है। बुंदेलखंड ऐसा इलाका है, जहां मानसून की बारिश पर ही खेती टिकी है। यहां खराब बारिश का सीधा मतलब फसल बर्बाद, किसान कर्जदार, और मजदूरों का दूसरे प्रदेश में पलायन होता है। इस परियोजना से दस लाख हेक्टेयर से अधिक जमीन सिंचित होगी।
सरकार का कहना है कि इससे लगभग 7 लाख किसान परिवारों, करीब 2,000 गांवों को फायदा होगा। मध्य प्रदेश के छतरपुर, टीकमगढ़, पन्ना, दमोह, विदिशा, सागर, शिवपुरी, दतिया, रायसेन और उत्तर प्रदेश के बांदा, महोबा, झांसी, ललितपुर का सूखा मिटेगी।
इस परियोजना के पूरे होने से लगभग 62 लाख लोगों को पेयजल उपलब्ध होगा। इनमें मध्य प्रदेश के 12 जिलों के करीब 44 लाख और उत्तर प्रदेश के 10 जिलों के 20 लाख से अधिक लोग शामिल हैं। बुंदेलखंड में कई गांव अब भी टैंकर पर निर्भर हैं। गर्मियों में पीने के पानी के लिए मीलों की दूरी तय करते हैं।
इसके अलावा बांध से 103 मेगावाट जलविद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा (करीब 219 मिलियन यूनिट) के वार्षिक उत्पादन का अनुमान है। गांव-देहात में बिजली की कमी वाले इलाके के लिए यह भी एक बड़ी सौगात है। निर्माण के दौरान हजारों मजदूरों को काम मिलेगा। बांध और नहर बनने के बाद मछलीपालन, सिंचाई-आधारित खेती, पर्यटन से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को नई रफ्तार।
बुंदेलखंड की पीड़ा असली है। परियोजना के पक्षधर जो कहते हैं, उसमें दम है। स्थानीय जल-संरक्षण के उपाय इस सूखे की भरपाई नहीं कर सकते। कई किसान खुलेआम कहते हैं — “हमें पानी चाहिए, बांध ही इसका एक रास्ता है।” यह समर्थन भी उतना ही जमीनी है, जितना आंदोलन का दर्द।
बहरहाल, जितने बड़े दावे हैं, उतने ही बड़े सवाल भी हैं — और ये सवाल केवल आंदोलनकारियों से नहीं, बल्कि विशेषज्ञ रिपोर्टों से भी उठते हैं।
पन्ना टाइगर रिजर्व बांध का डूब क्षेत्र है। यह परियोजना का सबसे जटिल पहलू है। कुल 6,017 हेक्टेयर वन भूमि चाहिए, जिसमें से 5,578 हेक्टेयर पन्ना टाइगर रिजर्व के अंदर है। डूब क्षेत्र लगभग 90 वर्ग किलोमीटर का बताया जा रहा है। याद रखिए — पन्ना वही रिजर्व है जिसने 2009 में अपने सारे बाघ खो दिए थे, और फिर देश के सबसे सफल बाघ-पुनर्स्थापन अभियान की बदौलत आज 60-70 बाघ यहां मौजूद हैं। इसके अलावा यहां केन में घड़ियाल, अभ्यारण्य में गिद्धों की लुप्तप्राय प्रजातियां, और माहसीर मछली भी हैं। सुप्रीम कोर्ट की केंद्रीय सशक्त समिति ने चेतावनी दी थी कि यह परियोजना यहां के “लाखों सालों की विकास प्रक्रिया को नष्ट कर देगी।”
आधिकारिक अनुमान है कि 7.2 लाख पेड़ काटे जाएंगे। वन सलाहकार समिति की उप समिति 23 लाख तक के आंकड़े देती है। आंदोलनकारियों का कहना है 46 लाख पेड़ों का कटना इसका विनाश करेगा। जो भी हो — बड़ी संख्या में पेड़ों का कटना सुनिश्चित है।
डौंढान बांध से 22 गांव प्रभावित होंगे। इनमें छतरपुर के 14 गांव (3,212 परिवार), पन्ना के 8 गांव (1,231 परिवार) हैं। लिंक कैनाल से 116 गांव प्रभावित होंगे। इनमें छतरपुर के 54, टीकमगढ़ के 41, निवाड़ी के 10 और झांसी के 11 गांव हैं। प्रभावित परिवारों में ज्यादातर आदिवासी हैं। पहले चरण में प्रभावित होने वाले 33.9 फीसदी अनुसूचित जनजाति के बताए गए।
आंदोलनकारियों की शिकायतों की सूची लंबी है। मसलन सर्वे में नाम छूटना, पात्र परिवारों का बाहर रह जाना, अपात्रों को मुआवजा मिलना, ग्राम सभा के दस्तावेज संदिग्ध होना, और भूमि अधिग्रहण कानून 2013 व वन अधिकार कानून 2006 का पालन न होना।
सरकार ने सितंबर 2023 में विशेष पुनर्वास पैकेज मंजूर किया है। इसके तहत हर वयस्क को ₹12.5 लाख (दंपति को एक इकाई मानकर), मकान के लिए ₹50,000 से ₹1.5 लाख, और कवर करोंदिया में प्लॉट।
चिता आंदोलन की मुख्य मांगों में से एक है रुंझ और मझगाय (पन्ना की सरकारी सिंचाई परियोजनाएं) के विस्थापितों का पैकेज ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹12.5 लाख किया जाए। इसे जुलाई 2026 में मोहन कैबिनेट ने मंजूरी दे दी (₹202.50 करोड़ अतिरिक्त / कुछ रिपोर्टों के मुताबिक ₹300 करोड़)।
आंदोलन की बड़ी मांग यह है — “हर वयस्क को अलग लाभार्थी माना जाए, न कि पूरे परिवार को।” कट-ऑफ तारीख (16 फरवरी 2024) भी विवाद में है। कच्ची मिट्टी के घर में रहने वाला ग्रामीण पूछता है — “34 हजार में कैसे घर बनेगा?”
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति 2019 में ही कह चुकी है कि केन नदी का ‘अधिशेष जल’ अप्रमाणित है और यह परियोजना आर्थिक रूप से अव्यवहार्य हो सकती है। जलवायु परिवर्तन के बीच बदलते बारिश के पैटर्न में क्या केन के पास सचमुच ज्यादा पानी रहेगा? यह सवाल आज भी अनुत्तरित है। सरकार ने पहले ही आंकड़े साझा करने से इनकार किया है। सरकार का कहना है कि यह ‘संवेदनशील’ मसला है।
इस परियोजना का पर्यावरणीय स्वीकृति-आधार (इन्वायरनमेंटल क्लीयरेंस) मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में और वन्यजीव स्वीकृति का सवाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। जबकि बांध बन रहा है। यह ठीक वैसा ही है जैसे जज के फैसले से पहले ही जमीन पर कब्जा कर लिया जाए।
20 सितंबर 2026 की घटना कोई अलग कहानी नहीं है। यह उसी संघर्ष की तीसरी लहर है। अप्रैल 2026 (5-16 अप्रैल) को ढोढ़न बांध स्थल पर पहला चिता आंदोलन हुआ। जुलाई 2026 (3 जुलाई से) में बराना नदी (कुपी गांव) पर महिलाओं ने फांसी सत्याग्रह भी किया। 19 जुलाई को पुलिस कार्रवाई में भटनागर समेत 150 लोग उठाए गए। और 20 सितंबर की भोर…( ऊपर पढ़ें)।
यह आंदोलन राजनीतिक नारा नहीं, किसी की आखिरी सांस है। जब कोई मां अपने बच्चे को लेकर नदी में खड़ी होकर चिता पर लेटती है, तो वह ‘विकास विरोधी’ नहीं, बल्कि ‘अपनी जिंदगी की रक्षा’ कर रही होती है। असली सवाल यही है — किसे विकास कहते हैं। नहर का पानी या उस पानी के लिए उजड़ता घर?
बुंदेलखंड का सूखा…। किसान की आत्महत्या, पलायन, टैंकरों की कतार — ये पीड़ा असली हैं, दिखावा नहीं। परियोजना के पक्षधर कहते हैं — “छोटे-छोटे तालाबों से अनिश्चित बारिश इस इलाके को नहीं बचा सकते। बड़ा प्रबंधन चाहिए।”
किसान कहते हैं — “हम सदियों से इसी नदी के साथ जीते आए हैं। आज वही नदी हमें बेघर कर रही है। हमें जंगल के बदले जंगल, जमीन के बदले जमीन, गांव के बदले गांव चाहिए — सिर्फ पैसा नहीं।”
प्रशासन का दावा है कि 2022 की मंजूरी के बाद लागत नहीं बढ़ी है। एक सवाल है — क्या यह परियोजना कार्बन के हिसाब से कार्बन-तटस्थ है?
सरकार बताती है कि छतरपुर में 4,000 से अधिक परिवारों को 750 करोड़ रुपये जारी हुए। 3,080 परिवारों को शुरुआती मंजूरी और फिर 638 और परिवार सर्वे के बाद जुड़े। पर आंदोलनकारी कहते हैं — “सर्वे में नाम छूटते हैं तो पता ही किसे चलता है?”
कलेक्टर कहते हैं — 400 करोड़ के कथित घोटाले की कोई लिखित शिकायत अब तक नहीं मिली। प्रमाण दें, निष्पक्ष जांच होगी। यह उचित मांग है — पर सवाल यह कि पारदर्शिता पहले क्यों नहीं सुनिश्चित की गई?
निष्कर्ष यह है कि — यह परियोजना न तो पूरी तरह ‘गेमचेंजर’ है, न पूरी तरह ‘बर्बादी’। यह एक ऐसा पुल है जो पानी तो ले जाएगा, लेकिन ऐसे लोग भी होंगे जिनके लिए वह पुल ही उनके सब कुछ को उल्टा ले जा रहा है।
यहां यह कहना जरूरी है कि प्रशासन की नीति संवाद की हो, दमन की नहीं — असहमति को अपराध नहीं माना जाए। मध्य प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का कहना सही है — “लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है।”
केन-बेतवा लिंक परियोजना देश की पहली नदी-जोड़ो परियोजना है — उसकी सफलता या विफलता आने वाली 30 परियोजनाओं की दिशा तय करेगी। इसीलिए यह सिर्फ बुंदेलखंड का नहीं, पूरे देश का मामला है।
सबसे बड़ा सवाल वही है जो बराना नदी के बीच बैठी महिलाओं ने दुनिया से पूछा — “विकास जो पानी लाता है, क्या उसकी कीमत हमेशा गरीब और आदिवासी ही चुकाते रहेंगे?”
इस सवाल का जवाब कागजों में नहीं, निर्माण स्थल पर टूटते घरों और चिकित्सालय में बिना खाए जीते आदमी के अनशन के बीच तलाशना होगा। पानी नदी का हो सकता है, पर उसकी धारा से उजड़ता घर कभी नदी का नहीं होता। जब तक सरकार पानी देने और प्रभावितों का सम्मान देने, दोनों करने को राजी नहीं होगी, तब तक यह कहानी यहीं नहीं रुकेगी — चाहे चिताएं बुझा दी जाएं या नदी किनारे नए सत्याग्रह जल उठें।
मुख्य स्रोत
संसद प्रश्न उत्तर (लोकसभा, जुलाई/अगस्त 2026) — लागत ₹44,605 करोड़, केंद्रीय सहायता ₹39,317 करोड़, जून 2026 तक ₹12,381.94 करोड़ व्यय, 6,017 हेक्टेयर वन भूमि (5,578.92 हेक्टेयर पन्ना टाइगर रिजर्व), 22 गांव/4,443 परिवार, 116 कैनाल गांव
द हिंदू (जुलाई 2026) — परियोजना इतिहास (NPP 1980, 30 लिंक), दिसंबर 2024 खजुराहो नींव, 103 MW जल + 27 MW सौर, पेड़ों का विवरण, एनजीटी/सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले
इंडियन एक्सप्रेस (लॉन्ग रीड, जुलाई 2026) — डौंढान बांध, 2,853 MCM जलाशय, 219 मिलियन यूनिट बिजली, पुनर्वास प्रगति, कवर करोंदिया कॉलोनी, संभावित अतिरिक्त भू-अर्जन
डब्ल्यू हिंदी (जुलाई 2026) — दिसंबर 2021 केंद्रीय मंत्रिमंडल मंजूरी, 21 गांव डूबने/7,000 परिवार विस्थापन, साक्षात्कार में भटनागर, कलेक्टर का बयान
डाउन टू अर्थ (अगस्त 2026) — फांसी सत्याग्रह, 19 जुलाई कार्रवाई, विस्थापितों की जमीनी शिकायतें, कवर सर्वे
इंडिया वाटर पोर्टल (जून-जुलाई 2026) — आंदोलन की अप्रैल-जुलाई कालक्रम, पीएम को पत्र, LARR 2013 व FRA 2006 संदर्भ
न्यू इंडियन एक्सप्रेस (जुलाई 2026) — ‘राहत की राजनीति’, कुछ किसानों का प्रोजेक्ट समर्थन, परियोजना-प्रभावित इलाकों के बाहर लाभ का विश्लेषणकर्ताओं का सवाल
मनी कंट्रोल (अगस्त 2026) — डौंढान गांव में पथराव, 19 जुलाई की बर्खास्तगी, केंद्र-राज्य के बीच जिम्मेदारी का तकरार, पुनर्वास बहस
थेलेंस / साहस समाचार / एनसीआर पत्रिका (अप्रैल-जुलाई 2026) — अप्रैल का 12-दिन आंदोलन, सितंबर 2023 विशेष पैकेज, ₹12.50 लाख, रुंझ-मझगाय पैकेज ₹202.50 करोड़
द प्रिंट/पीटीआई (अगस्त 2026) — मंत्रालय के जवाब की प्रामाणिक रिपोर्ट
