मुकुंद/अभिमन्यु, चित्रकूट आपदा अध्ययन केंद्र
हम जिस नदी को मां गंगा कहते हैं, उसकी आरती दूसरे देश के घाट पर क्यों उतारी गई — यह महज सवाल नहीं है ? टेम्स की सफाई और गंगा की तड़प — वह दर्पण, जो हमें हमारा चेहरा दिखाता है। एक सच, जो आंखें खोलने वाला है — जो देश (ब्रिटेन) यह सिखाता है कि “नदी में कचरा मत डालो”, उसी देश की टेम्स नदी इतनी निर्मल है कि वहां हमने अपनी मां की आरती उतारी और जिस गंगा को हम रोज “माँ” कहते हैं, उसके घाट पर ही उसका पानी निर्मल नहीं हो पाया।
तारीख 13 सितंबर 2026। दिन रविवार। लंदन की ऐतिहासिक टेम्स नदी के किनारे ग्रीनविच के ओल्ड रॉयल नेवल कॉलेज के सामने — हजारों लोग। हाथों में तेल के दीये, कंठों में मंत्र और हवा में उन दीयों की लौ। पहली बार टेम्स के तट पर गंगा आरती — “गंगा आरती ऑन द टेम्स: अ सिरेमनी ऑफ लाइट”। चिन्मय मिशन यूके और ‘टोटली टेम्स’ महोत्सव ने मिलकर इसका आयोजन किया।
इस कथा में संदेश है — आयोजकों ने साफ कहा, “आरती के दीप नदी में नहीं उतारे जाएंगे। पानी में कुछ नहीं डाला जाएगा, ताकि टेम्स को कोई नुकसान न हो।” हमारा ही संस्कार, हमारी ही आरती — और वे इसे ऐसी श्रद्धा से कर रहे हैं कि नदी बेखटके रहे। टेम्स उनके लिए इतनी प्यारी है कि वे उसे छूना तक नहीं चाहते।
और इधर — काशी का घाट? हरिद्वार का घाट? वहां हम हर शाम गंगा आरती करते हैं। पर आरती के दीये जब नीचे लहरों पर उतारते हैं तो उन्हीं के साथ तैरता है — सीवेज, पॉलिथीन, मलबा और अधजले शव। आरती की थाली और नदी की निर्मलता — दोनों अलग जगह खड़ी हैं। यही वह तकलीफ है, जो टेम्स की खबर ने हमारे चेहरे पर डाल दी।
लोग सोचते हैं टेम्स हमेशा से साफ थी। सच यह है कि 1858 में टेम्स को यूरोप का सबसे बड़ा गटर कहा जाता है। लंदन की बढ़ती आबादी और फैक्टरियों का कचरा सीधे टेम्स में बहता था। उस साल भीषण गर्मी में टेम्स की बदबू इतनी थी कि संसद सदस्य रूमाल से नाक ढाककर भागते थे। महारानी विक्टोरिया ने अपनी बेटी को लिखा था — “टेम्स की बदबू से मुझे बीमारी हो गई।” चार्ल्स डिकेन्स ने लिखा — “एक महान नदी की जगह चल रहा है घातक सीवर।”
तब इंजीनियर सर जोसेफ बजलगेट ने 82 मील की भूमिगत ईंट-सीवर प्रणाली, 1000 मील से ज्यादा नई पाइपलाइन को 318 मिलियन ईंटों से बनाया। यह प्रणाली आज भी काम कर रही है — 160 साल बाद भी।
1957: द्वितीय विश्वयुद्ध में बमबारी ने सीवरों को खराब किया। 1957 में नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के वैज्ञानिकों ने घोषणा की — क्यू से ग्रेवजेंड तक टेम्स में एक भी मछली नहीं। वैज्ञानिक लिखते हैं — “नदी से किसी जीव का जीना नामुमकिन था।”
और फिर — 1967 में पहली मछली (फ्लाउंडर) लौटी। 1980 में सैल्मन। आज टेम्स में 125 प्रजातियों की मछलियां हैं। सी-हॉर्स तक देखे गए। 1976 से सारा सीवेज उपचारित होकर जाता है। आज टेम्स को दुनिया की सबसे साफ शहरी नदियों में गिना जाता है।
और हम? अपनी मां को 1985 से नहला रहे हैं — 40 साल हो गए। गंगा एक्शन प्लान (1985), नमामि गंगे (2014) आज तक। केंद्र सरकार के अनुसार, अब तक ₹35,698 करोड़ स्वीकृत, 218 सीवेज परियोजनाएं, बनाई गई क्षमता 6,610 एमएलडी और अभी भी केवल 3,977 एमएलडी (138 संयंत्र) ही चालू — यानी 40 प्रतिशत काम अधूरा।
कैग की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड में 44 में से 12 यानी 32 फीसदी एसटीपी बिना उपचारित गंदा पानी सीधे गंगा में छोड़ रहे हैं। देवप्रयाग से हरिद्वार तक सिर्फ 93 किलोमीटर में टोटल कोलीफॉर्म 32 गुना बढ़ गया। 21 संयंत्र किसी घर से जुड़े ही नहीं — “प्रतीकात्मक” हैं।
बिहार (2025): हर दिन 1100 मिलियन लीटर सीवेज, उपचार क्षमता सिर्फ 343 — यानी 68 फीसदी गंदा पानी सीधे गंगा में।
दुनिया की सबसे शक्तिशाली सफाई-आराधना और सबसे बड़ी धार्मिक आस्था के बीच — गंगा का पानी आज भी काशी, कानपुर, फर्रुखाबाद में पूरी तरह नहाने लायक नहीं है।
गंगा मैली इसलिए नहीं है कि उसके पास पानी कम है। गंगा मैली है क्योंकि उसे मां कहने और मां की सेवा करने के बीच हम एक दीवार खड़ी कर चुके हैं। हम रोज कहते हैं “माँ गंगा” — पर उसकी गोद में अपना कचरा डालते हुए नहीं झिझकते। हम घाटों पर आरती करते हैं — पर उसी पानी में, जिसे पीकर मछली भी नहीं जी सकती।
टेम्स पर गंगा आरती एक सम्मान है — दुनिया हमारे संस्कार को मानती है। पर सम्मान का असली मतलब तब निकलेगा जब हमारी नदी भी वैसी हो जिस पर लोग “छूने से पहले सोचें”। टेम्स में दीये नहीं प्रवाहित किए गए— क्योंकि उनके लिए नदी की सुरक्षा आरती से बड़ी है। हमने कब ऐसा सोचा?
अंग्रेजों ने टेम्सल नदी को विज्ञान से साफ किया, हमने उसे श्रद्धा से बस “पवित्र” कहा। पवित्रता और निर्मलता अलग-अलग हैं। गंगा को पवित्र मानने से उसका कोलीफॉर्म नहीं घटता। उसे साफ करने के लिए उपचारित सीवेज, नालाबंदी, और ईमानदार निगरानी चाहिए।
टेम्स पर गंगा आरती के दीये बुझ जरूर गए, पर उनकी लौ एक सवाल बनकर हमारी आंखों में रह गई।
वह दिन सचमुच महान होगा जब — काशी की गंगा में नहा रहे किसी बुज़ुर्ग को पता चले कि यह पानी पीने जैसा है। और टेम्स के किनारे वे प्रवासी, जो आज आरती करते हैं, एक दिन अपनी जन्मभूमि की गंगा में निर्मल जल पाकर रो दें।
जब तक वह दिन न आए, हमें याद रखना है — “गंगा आरती” टेम्स पर हो इससे हमें गर्व है; पर “टेम्स की सफाई” हमारी नदी पर हो, इसकी प्यास नहीं बुझनी चाहिए। दुनिया ने हमें हमारे संस्कारों का ताज पहना है। अब हमें उस ताज के नीचे अपना चेहरा निर्मल करना है।
मां के नाम से ज्यादा पावन, मां का स्पर्श और मां का पानी होता है। वह स्पर्श तब तक अधूरा है, जब तक हमारी गंगा, उसके बच्चों की हथेलियों में, छलककर मोती नहीं बन जाती।
मुख्य स्रोत
-द हिंदू (पीटीआई, 14.09.2026) — “Historic first Ganga Aarti held on River Thames in UK”
-हिंदुस्तान टाइम्स (14.09.2026) — “In a first, Ganga aarti held on London’s Thames river”
-टाइम्स ऑफ इंडिया (14.09.2026) — “‘A ceremony of light’: First-ever Ganga Aarti…”
-आउटलुक इंडिया (16.09.2026) — “Why London’s Ganga Aarti on the Thames is facing backlash”
-नेशनल मैरीटाइम म्यूजियम (रॉयल म्यूजियम ग्रीनविच) — “An open sewer: pollution in the River Thames”
-हिस्टोरिक इंग्लैंड — “The Great Stink: How the Victorians transformed London”
-द कन्वर्सेशन (2022) — “From ‘biologically dead’ to chart-toppingly clean: the Thames’ extraordinary recovery”
-द इंडिपेंडेंट (2021) — “How did the Thames recover from being a ‘dead’ river…”
-विकिपीडिया — ग्रेट स्टिंक
-पीआईबी (जलशक्ति मंत्रालय) — नमामि गंगे चरण II, 2025 के आंकड़े
-डाउन टू अर्थ (03.02.2026, 17.04.2026, 15.07.2026) — सीपीसीबी 2025, सीएजी उत्तराखंड ऑडिट
-इंडियन एक्सप्रेस (11.03.2026) — “32-fold increase in coliform bacteria: CAG flags…”
-इंडिया वाटर पोर्टल (हिन्दी, 2026) — स्वच्छ गंगा मिशन की हकीकत (सीएजी)
-डाउन टू अर्थ (18.03.2025) — बिहार गंगा सीवेज रिपोर्ट (बीएसपीसीबी)
